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महात्मा गांधी के एक इशारे पर आजादी की लड़ाई में कूद पड़ा था यह शख्स, ले लिया था बड़ा व्रत

वर्ष 1930 में महात्मा गांधी के संपर्क में आये थे सुलतानपुर के बाबू गनपत सहाय, वीडियो में देखें- क्या बोले उनके सहायक रहे महेन्द्र नाथ श्रीवास्तव...
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babu ganpat sahai

महात्मा गांधी के एक इशारे पर आजादी की लड़ाई में कूद पड़ा था ये शख्स, किये ये बड़े काम

सुलतानपुर. गांधी जयंती प्रतिवर्ष 02 अक्टूबर को मनाई जाती है। आजादी के दौरान वह वर्ष 1930 में सुलतानपुर आये थे। यहां वह विक्टोरिया पैलेस में ठहरे थे, जहां अब नगर पालिका कार्यालय है। उस वक्त भी सुलतानपुर में आजादी की ज्वाला धधक रही थी। इस बीच बाबू गनपत सहाय गांधी जी के सम्पर्क में आये और उनके विचारों से प्रभावित होकर सरकारी नौकरी छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए। महात्मा गांधी के बंग-भंग आंदोलन में गनपत जी ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। महात्मा गांधी के आह्वान पर ही विपिनचन्द्र पाल के सम्पर्क आने के बाद उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ी और देश सेवा का व्रत ले लिया। महात्मा गांधी के सम्पर्क में रहते बाबू गनपत सहाय अधिवक्ता के रूप में सामाजिक जीवन में उतरे।

बाबू गनपत सहाय के सहायक रहे बाबू महेन्द्र नाथ श्रीवास्तव ने बताया कि बाबू गनपत सहाय जमींदार परिवार से थे। 1930 में जब महात्मा गांधी जिले के प्रवास पर आए तो वे विक्टोरिया पैलेस (अब नगरपालिका कार्यालय भवन) में ठहरे थे। वहीं पर बाबू गनपत सहाय महात्मा गांधी से मिले थे। महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर बाबू गनपत सहाय ने सरकारी नौकरी छोड़ दी और स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। वह अत्यंत मेघावी थे। म्योर कॉलेज इलाहाबाद से टॉप करने के बाद उन्हें वहीं पर अंग्रेजी का प्रवक्ता नियुक्त कर दिया गया।

जिला कांग्रेस कमेटी के पहले अध्यक्ष बने
बाबू महेन्द्र नाथ श्रीवास्तव ने बताया कि प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हो चुका था। महात्मा गांधी के कहने पर उन्होंने कांग्रेस के बैनर तले किसानों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जिले में कांग्रेस की स्थापना में भी बाबू गनपत सहाय अगली पंक्ति में रहे। गांधी जी की मर्जी से ही वर्ष 1930 में बाबू गनपत सहाय को जिला कांग्रेस कमेटी का पहला अध्यक्ष चुना गया। महात्मा गांधी के अलावा उनके मौलाना आजाद, सरोजनी नायडू, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, पीडी टण्डन और सुभाष चन्द्र बोस से व्यक्तिगत सम्बन्ध रहे।

गांधी जी के आंदोलनों में लिया भाग
जमींदार परिवार की पृष्ठभूमि होने की वजह से सीताकुंड स्थित उनका आवास राष्ट्रीय आंदोलन का केन्द्र बन गया था। देश के सभी बड़े नेता स्वतंत्रता आंदोलन में उन्हीं के घर रुकते थे। महात्मा गांधी द्वारा चलाये गए असहयोग आंदोलन, अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में बाबू गनपत सहाय को जेल जाना पड़ा था। उस दौरान वह जिले के काफी लोकप्रिय नेता बन चुके थे।

विधायक-सांसद रहे
वर्ष 1946 की अन्तरिम सरकार में वह विधायक भी चुने गए। महात्मा गांधी की मृत्यु के बाद 1961 में उन्होंने तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री गोविंद बल्लभ पंत के पुत्र केसी पन्त को हराकर सांसद बने थे। सन 1969 में उनका देहावसान हो गया। जिले में महात्मा गांधी स्मारक इंटर कॉलेज सहित कई शिक्षण संस्थान उनकी स्मृति को जीवंत बना रही है।

बाबूजी ने दान कर दी सारी संपत्ति
बाबू गनपत सहाय के अधिवक्ता लिपिक (मुंशी) रहे मोतीलाल मौर्य ने बताया कि बाबूजी हम लोगों से अक्सर महात्मा गांधी के बारे में बातें किया करते थे। उन्होंने बताया कि सन 1930 में महात्मा गांधी के जिले में प्रवास के दौरान उनसे मिलने के बाद कैसे वह स्वतंत्रता आंदोलन में कूदे थे। बाबू जी महात्मा गांधी के विचारों से इस कदर प्रभावित थे कि उन्होंने अपनी सारी संपत्ति दान कर दी थी।

वीडियो में देखें- क्या बोले बाबू गनपत सहाय के सहायक रहे बाबू महेन्द्र नाथ श्रीवास्तव...

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