
सूरत. फुटपाथ पर बैठकर पढ़ रहे बच्चों को निहारती मां का यह चेहरा देखकर फिल्म आराधना के ‘चंदा है तू मेरा सूरज है तू, ओ मेरी आंखों का तारा है तू...’ गीत की पंक्तियां बरबस याद आ जाती हैं। इन आंखों में आंख के तारों को बड़ा आदमी बनाने की चाह साफ दिख रही है। बच्चों की तन्मयता भी बताती है कि मंजिल तक पहुंचने की ललक में सहूलियतों की राह तकना बेमानी है। इन सबके बीच पढऩे-पढ़ाने के लिए गढ़े गए सरकारी नारे अपना वजूद खोते दिखते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात का मुख्यमंत्री रहते दो अहम नारे दिए थे। एक था वांचे गुजरात और दूसरा था बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ। इनका मकसद बच्चों को पढ़ाई से जोडऩा और बेटियों को बराबरी का दर्जा देकर उनमें स्वावलंबन का भाव जगाना था। दोनों नारे सरकारी दस्तावेजों का हिस्सा ही बनकर रह गए। इसकी जीती जागती मिसाल है झारखंड से मजदूरी के लिए सूरत आया यह परिवार। पति-पत्नी दोनों जने परिवार पालने के लिए दिनभर मजदूरी करते हैं। सपने देखने वाले हर व्यक्ति की तरह ये भी अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा कर बड़ा आदमी बनाना चाहते हैं।
दोनों बच्चे मजूरा गेट स्थित नगर प्राथमिक स्कूल में कक्षा तीन और दो में पढ़ते हैं। रहने को घर नहीं इसलिए फुटपाथ ही इनका बसेरा है, सो स्कूल से छूटकर सोना-खाना और पढऩा फुटपाथ पर ही होता है। स्कूल की फीस भी मजदूरी से चुका रहे हैं। शहर की संस्थाएं जरूरतमंद बच्चों को शिक्षण सामग्री वितरित करने की मुहिम चलाती हैं। इन संस्थाओं की नजर भी ऐसे कई बच्चों पर नहीं पड़ती। शिक्षण सामग्री के अभाव में इन जैसे कई बच्चे किसी तरह अपनी पढ़ाई का क्रम जारी रखे हुए हैं।
जहां मिल जाए काम वहीं ठिकाना
झारखंड से आया यह परिवार अपनी पहचान बताना नहीं चाहता। महिला के मुताबिक किसी एक जगह पर कोई बंधी-बंधाई नौकरी नहीं मिली तो अब जब जहां काम मिलता है, वहीं ठिकाना बना लेते हैं। काम की तलाश में उनके साथ गांव से कई परिवार आए थे और सभी अलग-अलग जगहों पर मजदूरी कर रहे हैं।

Updated on:
18 Feb 2018 08:19 pm
Published on:
19 Feb 2018 08:01 am
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