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VNSGU : आखिर खुला महासचिव चुनाव का रास्ता, जनवरी में होंगे

विवाद के साथ शुरू हुई बैठक, वी.डी.नायक सिंडीकेट से बर्खास्त

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VNSGU : आखिर खुला महासचिव चुनाव का रास्ता, जनवरी में होंगे

सूरत.

वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय संबंद्ध महाविद्यालयों में आखिरकार महासचिव पद चुनाव का रास्ता खुल गया है। शनिवार को हुई सिंडीकेट की बैठक में महासचिव पद के चुनाव को लेकर फैसला किया गया। सिंडीकेट की शुरुआत विवाद से हुई और कुलपति ने सिंडीकेट सदस्य वी.डी.नायक को बर्खास्त कर दिया।
सिंडीकेट की बैठक से पहले एजेंडे को लेकर कई सिंडीकेट सदस्यों ने कुलपति को पत्र लिखे थे। सिंडीकेट के मिनिट्स को लेकर आपत्ति जताई गई थी। कुलपति पर मिनिट्स में गड़बड़ी करने का आरोप लगाया गया था। इसी मामले को लेकर सिंडीकेट की बैठक शुरू होते ही विवाद शुरू हो गया। सिंडीकेट सदस्य वी.डी.नायक और कुलपति डॉ.शिवेन्द्र गुप्ता के बीच गरमागरम बहस हुई। कुलपति ने वी.डी.नायक को छह सिंडीकेट बैठकों के लिए बर्खास्त करने का फैसला किया। नायक बैठक छोडक़र नहीं गए तो कुलपति ने सुरक्षाकर्मियों को बुलाने का आदेश दिया। मामला गंभीर रूप धारण करता, इससे पहले नायक बैठक छोड़ कर चले गए। इसके बाद सिंडीकेट में अन्य मुद्दों पर चर्चा शुरू हुई। सभी की निगाह महासचिव पद के चुनाव पर टिकी थीं। बैठक में सिंडीकेट सदस्यों ने जनवरी में महाविद्यालयों में चुनाव करवाने का फैसला किया। चुनाव 1 से 12 जनवरी के बीच होंगे। इसके अलावा सिंडीकेट में भगवान महावीर फाउंडेशन को विश्वविद्यालय बनाने के लिए एनओसी पत्र को लेकर भी चर्चा की गई। सिंडीकेट ने तय किया कि भगवान महावीर फाउंडेशन सभी प्रमाण पत्र मंगवाए जाएं, बाद में उसे एनओसी देने पर विचार किया जाएगा। बैठक में फैक्ट कमेटी के विभिन्न मामलो पर भी फैसला किया गया। सिंडीकेट में वित्त समिति के मामलों पर भी देर तक चर्चा चली। टेंडर के मामलों में महत्वपूर्ण फैसला किया गया। कोई पार्टी अगर टेंडर पास होने के बाद काम करने से इनकार करेगी तो उसकी डिपोजिट राशि जब्त कर ली जाएगी तथा उसे ब्लैक लिस्ट कर दिया जाएगा।

दो साल से छात्रसंघ चुनाव नहीं
विश्वविद्यालय संबद्ध महाविद्यालयों में दो साल से छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए हैं। पहले तत्कालीन कुलपति डॉ.दक्षेश ठाकर का कार्यकाल पूर्ण हो रहा था, इसलिए इस मामले में सिंडीकेट ने रुचि नहीं ली। डॉ.शिवेन्द्र गुप्ता ने कुलपति का पदभार संभाला, तब भी इस मामले पर ध्यान नहीं दिया गया। चुनाव की मांग उठने लगी तो मामला सिंडीकेट में पहुंचा। कुलपति और सिंडीकेट सदस्यों ने मामला प्राचार्यों पर छोड़ दिया। प्राचार्यों ने इलेक्शन के बदले सिलेक्शन की राय दी। सिंडीकेट चुनाव के कारण कुलपति और अन्य सिंडीकेट सदस्य प्राचार्यों के फैसले के खिलाफ नहीं जाना चाहते थे, क्योंकि ङ्क्षसडीकेट में सबसे ज्यादा मत प्राचार्यों के थे। सिंडीकेट चुनाव के बाद छात्रसंघ चुनाव का मुद्दा फिर गरमाया तो इसे शनिवार की सिंडीकेट के एजेंडे में शामिल किया गया।