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Diwali 2022: बुंदेलखंड में रामराजा के दर्शन के लिए भक्तों की कतार, ओरछा में मन रही है भव्य दिवाली

- राजाराम के दर्शन के लिए दिवाली पर ओरछा से ही नहीं बाहर से भी अनेक भक्त आए हैं। - भगवान राम का वर्तमान के उत्तर प्रदेश की ही तरह मध्यप्रदेश से भी खास रिश्ता है। ऐसे में जहां राम अयोध्या मे राम लला हैं ताे वहीं मध्यप्रदेश में राम राजा हैं। दरअसल यह जगह बुंदेल खंड की अयोध्या है, जिसे ओरछा कहा जाता है। यहां पर भगवान श्री रामराजा सरकार विराजते हैं और यहां आज भी समस्त काम श्री रामराजा के आदेश पर ही होते हैं।
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Deepesh Tiwari

Oct 24, 2022

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Diwali 2022: भारत में राम केवल अयाेध्या के ही नहीं हैं बल्कि यहां राम रग रग में हैं। ऐसे में जहां वर्तमान के उत्तर प्रदेश में भगवान राम रामलला के नाम से जाने जाते हैं ताे वहीं मध्यप्रदेश से राम का रामराजा के रूप में भी रिश्ता है।

दरअसल उत्तरप्रदेश की अयोध्‍या की भांति ही मध्यप्रदेश के बुंदेल खंड क्षेत्र में भी एक अयोध्या है। जहां भगवान श्री रामराजा सरकार विराजते हैं। इस मप्र की अयोध्या में आज भी श्री रामराजा के आदेश पर ही सभी काम होते हैं। ऐसे में यहां की दीवाली भी अन्य स्थानाें से काफी अलग ही रहती है।

वहीं इस बार भी दिवाली पर श्री रामराजा सरकार के मंदिर को सजाया गया है और दीप जलाए जा रहे हैं। वहीं दिवाली की सुबह मतलब सोमवार, 24 अक्टूबर की सुबह से ही मंदिर में रामराजा सरकार के दर्शन के लिए भक्तों की लंबी कतार लगी हुई हैं। ऐसे में श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए प्रशासन ने भी मंदिर परिसर में सुरक्षा व्यवस्था के पूर्ण इंतजाम किए हैं।

बेतवा नदी के किनारे स्थित इस नगरी में भगवान श्रीराम, रामराजा की तरह पूजे जाते हैं। अपने राजा के दर्शन के लिए यहां ओरछा से ही नहीं बाहर से भी अनेक भक्त आए हुए है। ऐसे में ये भक्त रामराजा के दर्शन के बाद दीप जलाएंगे और पटाखे भी चलाएंगे।

रामराजा की कथा
दरअसल मान्यता है कि ओरछा की महारानी कुंअर गणेश संवत 1631 में रामराजा को अयोध्या से गोद में लाई थी। भगवान को पाने के लिए उन्होंने अयोध्या में सरयू तट पर तपस्या की। लेकिन भगवान नहीं मिले। ऐसे में वह नदी में कूद गई। जहां पर उन्हें भगवान राम की प्रतिमा मिली। जिसे वे गोद में लेकर ओरछा आई। लेकिन रामराजा सरकार ने ओरछा आने से पहले रानी के सामने शर्त रखी थी कि वे गोद में ही चलेंगे और जहां पर उन्होंने विराजित कर दिया, वहीं रह जाएंगे।

जब वे ओरछा आईं तो राजा मधुकर शाह ने मंदिर पहले ही बनवा दिया था। वे रामराजा को रसोई में रखकर मंदिर देखने चली गई। मंदिर देखने के बाद जब वे लेने आई तो रामराजा सरकार ने शर्त बताई। तब से रामराजा सरकार का स्थान महल की वही रसाेई है और वहीं पर उनका दरबार लगता है।

ओरछा का रामराजा मंदिर भारत मे विशेष स्थान रखता है। इसी कारण यहां प्रतिवर्ष औसतन पांच लाख से अधिक धर्म जिज्ञासु स्वदेशी पर्यटक आते हैं और लगभग बीस हजार से अधिक विदेशी पर्यटक ओरछा की पुरातात्विक महत्व के खूबसूरत महलों, विशाल किले, शीश महल, जहांगीर महल, रायप्रवीण महल, लक्ष्मी मंदिर, चतुर्भुज मंदिर, बेतवा नदी के तट पर स्थित छतरियों और नदी किनारे के जंगल मे घूमने वाले जानवरों की अटखेलियां सहित अनेक ऐतिहासिक इमारतों को निहारने के लिए प्रतिवर्ष आते हैं।

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राम ओरछा के राजा, इसलिए हैं
ओरछा आने से पहले भगवान राम ने रानी के सामने शर्त रखी थी कि ओरछा के राजा वही होंगे और उनका ही राज चलेगा। रानी ने उनकी शर्त मान ली थी। इसलिए ओरछा का राजा राम को ही माना जाता है और तब उनका ही राज यहां पर चलता है। रामराजा दरबार में पुलिस गार्ड हमेशा तैनात रहता है और तीनों समय रामराजा का सलामी देता है।

मान्यता के अनुसर विवाह पंचमी के दिन ओरछा के तत्कालीन शासक मधुकरशाह ने, उनकी पत्नी द्वारा भगवान राम काे दिए गये वचन का पालन करते हुए उनका राजतिलक कर दिया था। बुंदेलखंड में ओरछा के तत्कालीन शासक मधुकरशाह को भगवान श्रीराम के पिता और महारानी गणेश कुंअर को मॉं का दर्जा प्राप्त है।

शास्त्रोक्ति के अनुसार ऐसी मान्यता है कि भगवान श्रीराम के पिता महाराज दशरथ का वचन घर्म निभाने के दौरान निधन हो गया था और उनका वहां राजतिलक नहीं हो सका था। तब ओरछा के तत्कालीन शासक मधुकर शाह और महारानी गणेश कुंअर ने माता-पिता होने का धर्म निभाते हुए ओरछा में भगवान श्रीराम का राजतिलक कर पिता होने का दायित्व पूरा कर ओरछा नगरी राजतिलक में भेट कर दी थी और तभी से उनके वंशज इस परम्परा को निभाते चले आ रहे हैं।