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Shri Ram Raja mandir story: श्री राम राजा सरकार के ओरछा आगमन के 450 वर्ष

450वां जन्मोत्सव: संवत 1631 में श्रीराम नवमी को ओरछा पहुंचे थे श्रीरामराजा सरकार, 8 माह 27 दिन में पहुंचे थे

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रामनवमी पर ओरछा से विशेष।

टीकमगढ़/ओरछा. बुंदेलखंड की अयोध्या कहे जाने वाले ओरछा में इस बार की श्रीराम नवमी अन्य वर्षों की तुलना में कुछ अलग और खास होगी। संवत 2080 की चैत्र शुक्ल नवमी को श्रीरामराजा सरकार का ओरछा में 450वां जन्मोत्सव मनाया जाएगा। संवत 1631 को श्रीराम नवमी के पर्व पर ही भगवान अयोध्या से चलकर ओरछा पहुंचे थे और यहां पर उनके जन्मोत्सव के साथ ही उनका राजतिलक किया गया था।

एक समय वीरान हो गया था ओरछा

इतिहासकार अवस्थी बताते है कि अयोध्या से ओरछा आने के लिए श्रीरामराजा सरकार ने महारानी कुंवरगणेश के सामने तीन शर्तें रखी थी। पहली कि वह पुष्य ही पुष्य नक्षत्र में यात्रा करेंगे। दूसरी जहां एक बार बैठा दिया जाएगा वहां से नहीं हटेंगे और तीसरी वह जहां विराजमान होंगे वहां सब वीरान हो जाएगा। वह बताते हैं कि तीसरी शर्त का असर भी ओरछा में दिखाई दिया और कुछ समय बाद ओरछा राजवंश ने ओरछा की पूरी सत्ता श्रीराम को सौंप दी और खुद टीकमगढ़ आकर रहने लगे। उनका कहना था कि वह समय ऐसा था जब ओरछा एक प्रकार से वीरान सा हो गया था। केवल मंदिर के कारण ही कुछेक लोग यहां पर निवास करते थे। वहीं राजपरिवार के विश्वजीत सिंह बताते हैं कि सन 1783 में महाराज विक्रमाजीत सिंह ओरछा को छोड़ कर पहले लिधौरा पहुंचे और फिर कुछ दिन रहने के बाद टीकमगढ़ को राजधानी बनाया।

संवत 1631 की चैत्र शुक्ल नवमी को ही ओरछा राजवंश की महारानी कुंवर गणेश के प्रेम के वशीभूत होकर श्रीराम राजा अपनी जन्मभूमि अवध को छोड़ कर अवधेश से ओरछेश हो गए थे। इतिहासकार पंडित हरि विष्णु अवस्थी बताते है कि महारानी कुंवर गणेश ने श्रीराम राजा को अयोध्या से ओरछा लाने की पूरी यात्रा पुष्य नक्षत्र में की थी। ऐसे में उन्हें अयोध्या से ओरछा आने में पूरे 8 माह 27 दिन का समय लगा था। वह बताते है कि कुंवर गणेश ने श्रावण शुक्ल पंचमी संवत 1630 को भगवान को अपनी गोद में लेकर यह यात्रा शुरू की थी और वह चैत्र शुक्ल नवमी संवत 1631 को ओरछा पहुंची थी।

रसोई से श्रीरामराजा लोक तक का सफर

भगवान श्रीराम के ओरछा आगमन के बाद से यहां पर तमाम बदलाव देखे गए तो यहां का इतिहास अपने गर्भ में कई रहस्य और कहानियों को छिपाए हुए है। सबसे अहम किवदंती को भगवान के ओरछा आगमन की है। जब अयोध्या से खबर पहुंची कि महारानी रामलाल को लेकर ओरछा आ रही है तो यहां पर महाराज मधुकर शाह ने भगवान के लिए मंदिर का निर्माण शुरू करा दिया। राजमहल के ठीक सामने उन्होंने महल की ऊंचाई लेते हुए चतुर्भुज मंदिर का निर्माण कराना शुरू किया। मंदिर का निर्माण पूर्ण नहीं हो सका था और महारानी रामलाल को लेकर ओरछा पहुंच गई। ऐसे में भगवान को मंदिर निर्माण पूर्ण होने तक श्रीराम नवमी के दिन रसोई में विराजमान कर उनका पूजन किया गया और जन्मोत्सव मनाया गया। वहीं जब मंदिर का निर्माण पूर्ण हुआ और भगवान को वहां पर स्थापित करने के लिए प्रयास किया गया तो प्रतिमा हिली भी नहीं। तब रानी को भगवान को दिया गया वचन याद आया कि एक बार जहां विराजमान किया जाएगा, वहीं पर रह जाएंगे और तब से भगवान रसोई में ही विराजमान है। रसोई में विराजमान होकर यहां का राजकाज चला रहे श्रीराम राजा सरकार की नगरी में समय से कई विकास कार्य होते रहे। इस दौरान मंदिर का भी कई बार सौंदर्यीकरण किया गया तो अन्य काम भी हुए। समय के साथ यहां पर आयोजित होने वाले प्रमुख पर्व विवाह पंचमी और राम जन्मोत्सव का आयोजन भी व्यापक तरीके से किया जाने लगा। पिछले वर्ष श्रीराम नवमी के पर्व पर यहां पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी पत्नी साधना सिंह के साथ शामिल हुए तो यहां पर 5 लाख दिए जलाकर दीपोत्सव का आयोजन किया। अब यहां पर राम राजा लोक का निर्माण किया जाएगा। फरवरी माह में ओरछा पहुंचे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसकी घोषणा की थी तो इसके लिए बजट में भी प्रावधान कर दिया गया है। बताया जा रहा है कि जल्द ही यहां पर पूरा ब्लू प्रिंट तैयार कर महाकाल की नगरी उज्जैन की तर्ज पर यहां पर राम राजा लोक का निर्माण किया जाएगा।

प्रेम और पराक्रम की कहानी है श्रीरामराजा सरकार का ओरछा आगमन

महाराज और महारानी के बीच हुई तकरार के बाद महारानी कुंवर गणेश अपने आराध्य को लाने अयोध्या निकल पड़ती है। वहां सरयू किराने निरंतर उनकी साधना करने के बाद भी जब भगवान दर्शन नहीं देते है तो वह सरयू नदी में अपने प्राण देने उतर जाती है और वहीं पर भगवान बाल रूप में उनकी गोद में आ जाते है। इसके बाद महारानी तीन वचनों के साथ उन्हें लेकर ओरछा आ जाती है। वहीं भगवान के ओरछा आगमन को लेकर एक अन्य घटना इतिहासकार बताते है। पंडित हरि विष्णु अवस्थी कहते है कि उस समय पूरे देश में अकबर का शासन था। अकबर ने एक बार बैठक में महाराजा मधुकर शाह से कहा कि हमारे देश में दीन-ए-लाही धर्म चलता है, ऐसे में आप इस प्रकार से तिलक आदि लगाकर न आए। हरिविष्णु अवस्थी बताते है कि यह बात मधुकर शाह को अंदर तक कचोट गई और वह अगली बैठक में उससे भी बड़ा तिलक लगाने के साथ ही बड़ी मालाओं के साथ दरबार में पहुंच गए। मधुकर शाह का इस प्रकार से अकबर के दरबार में पहुंचने पर अन्य राजा परेशान हो उठे कि कहीं आज कुछ बड़ी घटना घटित न हो जाए। मधुकरशाह के इस आचरण को देखते हुए अकबर भी बिलकुल बदल गए और बोले कि हम आपकी भक्ति से प्रसन्न हुए, आज से आपके द्वारा लगाए जाने वाले तिलक को मधुकरशाही तिलक के नाम से जाना जाएगा।

हरिविष्णु अवस्थी कहते है कि उस समय देश में तमाम राजा हिंदू थे। ऐसे में अकबर के मन में डर था कि कहीं मधुकरशाह के खिलाफ कोई कार्रवाई करने से सभी एक न हो जाए। ऐसे में उसने यह किया। जब यह बात धीरे-धीरे अयोध्या पहुंची तो वहां पर भगवान की प्रतिमाओं को सुरक्षित स्थान पर छिपाने वाला साधु ओरछा पहुंचा। यहां पर उसने मधुकरशाह को पूरी बात बताई और इसके बाद उन्होंने भगवान की प्रतिमाओं को सुरक्षित लाने के लिए महारानी को अयोध्या भेजा। वह कहते है कि महाराज मुधकर शाह और महारानी निश्चित रूप से भगवत प्रेमी थी, तभी तो भगवान ने उन पर इतनी कृपा की। वह कहते है कि ओरछा में भगवान के आगमन की कहानी प्रेम और पराक्रम की कथा है।

कुंवर गणेश को मिला कौशल्या का दर्जा

भगवान के प्रति असीम प्रेम करने वाली महारानी कुंवर गणेश को माता कौशल्या की उपमा दी जाती है। उनके लिए कहा जाता है कि बैठे जिनकी गोद में विश्व मान विश्वेष, कौशल्या सानी भई रानी कुंवर गणेश। विदित हो कि उन्हीं के प्रेम और पराक्रम का परिणाम है कि भगवान अपनी जन्म भूमि को छोड़ कर ओरछा आ गए और यही के होकर रह गए। उनके कारण ही ओरछा को बुंदेलखंड की अयोध्या होने का दर्जा मिला है। विदित हो कि ओरछा में हर वर्ष श्रीराम नवमी के पर्व पर निकाली जाने वाली शोभायात्रा में रानी कुंवर गणेश की झांकी को शामिल किया जाता है।

कंटेंट- अनिल रावत, पुष्पेन्द्र गौरलेआउट- नितिन सदाफल