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रघुपति राघव राजा राम, खोज मिटा गए लाला राम…

- आजादी के बाद टीकमगढ़ रियासत पर दूसरी बार चली सियासत की छैनी  

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Tikamgarh divisional tales

Tikamgarh divisional tales

संजय कुमार सिंह टीकमगढ़. राजा राम की नगरी ओरछा को तिलिस्मी महलों की नगरी भी कहा जाता है। यहां के महलों की हर दीवार में राज छिपे हैं। हर नक्काशी में कहानियां छिपी हैं। यहां पहुंचकर पहली बार में आप जितना जान पाते हैं, उससे ज्यादा जानने की उत्सुकता बढ़ती जाती है। यह सिलसिला यूं ही चलता रहता है।

राजनीतिक सिनेरियो में देखें तो भी कहानी कम दिलचस्प नहीं। ओरछा रियासत का 1947 में भारतीय संघ में विलय होते ही टहरौली तहसील को झांसी (यूपी) में मिला लिया गया। यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने टहरौली तहसील को एक तरह से ओरछा रियासत से जबरन छीन लिया था। तब भी मप्र के राजनेता मुंह ताकते रह गए थे। ओरछा रियासत के तत्कालीन व आखिरी दीवान पंडित लालाराम वाजपेयी ने कुछ नहीं किया। वे हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे और 50 गांव वाली टहरौली तहसील को झांसी में शामिल कर लिया गया। इन गांवों में बेतवा नहर का पानी लगता था। जाहिर है मिलाए गए ये गांव कहीं अधिक खुशहाल थे। तब ओरछा व टीकमगढ़ सहित पूरे बुंदेलखंड में यह जुमला आम लोगों की जुबान पर चढ़ गया था...
रघुपति राघव राजा राम,
खोज मिटा गए लाला राम।

ओरछा राजपरिवार के सदस्य महाराज मधुकर शाह जूदेव (नाती राजा) ने पत्रिका से बातचीत में अतीत के कुछ पन्ने पलटे तो बहुत कुछ सामने आया जिससे इस जिले की जनता आज भी अनभिज्ञ है। उन्होंने कहा कि टीकमगढ़ जिले पर दूसरी बार सियासत की छैनी चलाकर निवाड़ी को अलग कर दिया गया। और हां, वर्तमान निवाड़ी रेलवे स्टेशन का नाम पहले अरजाल (निकट के गांव का नाम) था। अरजाल से निवाड़ी रेलवे स्टेशन कब और कैसे हो गया, यह शोध का विषय है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि निवाड़ी के बजाय यदि ओरछा को ही जिला बना दिया जाता तो शायद लोगों की इतनी नाराजगी नहीं होती। ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से ओरछा की देश ही नहीं, पूरे विश्व में पहचान है। यह पहचान लगभग ५०० वर्ष की है।

उन्होंने एक प्रसंग बताते हुए कहा कि तत्कालीन राजा मधुकर शाह जूदेव (प्रथम) की पत्नी रानी गणेश कंवर अवध से भगवान श्रीराम की मूर्ति लेकर आईं और ओरछा में स्थापना की। महारानी गणेश कंवर को स्वप्न में भगवान श्रीराम नेे यहां राजा के रूप में राज करने की बात कही। इसके बाद बुंदेला राज परिवार ओरछा से अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर टीकमगढ़ आ गया, लेकिन ओरछा से टीकमगढ़ का संबंध अनवरत रूप से बना रहा।
एक अन्य सवाल के जवाब में राज परिवार केमधुकर शाहजी जूदेव ने कहा कि यहां के स्थानीय नेता ही आवाज नहीं उठाएं तो कोई क्या कर सकता है। लोकतंत्र में नेताओं को ही आवाज उठानी चाहिए। पूर्व राज परिवार कर ही क्या सकता है...।
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चोरी का आज तक नहीं हुआ खुलासा
आजादी के बाद ओरछा मंदिर पर सरकार का नियंत्रण हो गया। मंदिर की अकूत सम्पति पर कुछ रसूखदार सियासतदां लोगों की बुरी नजर थी। एक साजिश के तहत लगभग 80 के दशक में रामराजा मंदिर से कलश व आभूषण चोरी की वारदात को अंजाम दिया गया। इस घटना के बाद सियासी गलियों में खूब हलचल हुई। आस्थावान लोगों ने सामाजिक संगठनों के साथ विरोध दर्ज कराया। उस समय तरह-तरह की चर्चा लोगों की जुबां पर चढ़ गई। मंदिर से चोरी हुए कलश व आभूषण का आज तक पता नहीं चला। इस घटना के बाद बुंदेलखंड में एक और जुमला खूब जोरों से रहा।