
टोडारायसिंह. बिना पानी व रखवाली के टोडारायसिंह के बागात क्षेत्र में मिलनेे वाली राणी (मीठा फल) का स्वाद लोगों को नसीब नहीं हो रहा है।
टोडारायसिंह. बिना पानी व रखवाली के टोडारायसिंह के बागात क्षेत्र में मिलनेे वाली राणी (मीठा फल) का स्वाद लोगों को नसीब नहीं हो रहा है। जबकि एक समय था जब टोडारायसिंह बागात क्षेत्र में राणी के सैकड़ों पेड़ हुआ करते थे, इनमें हाडी रानी कुण्ड, पंचायत समिति का प्लाट व चक्रा बावडी के इर्द-गिर्द सघन वृक्षावली के रूप में राणी के पेड़ होते थे।
समय बीतने के साथ इनका नामोनिशां मिटता गया। बागात क्षेत्र में पानी के अभाव में धीरे-धीरे इन वृक्षों की संख्या घटने लगी है। हालांकि टोडारायसिंह का बागात क्षेत्र समय पर अलग-अलग फलों की पैदावार देता रहा है, इनमें सर्दी में सीताफल तो गर्मी में अलग मिठास लिए राणी का फल प्रमुख होता है।
लेकिन पेड़ों की घटती संख्या के बीच पहले की अपेक्षा अब इनकी पैदावार नही है, फिर भी बागात क्षेत्र में करीब दो दर्जन पेड़ों से गर्मी में लोगों को राणी का स्वाद मिलता रहा है। इनकी पैदावार अन्यत्र नहीं होने से लोग परिचितों व सम्बन्धियों को यह फल को अवश्य भिजवाते है।
गर्मी के दिनों कस्बे के माणक चौक, बस स्टैण्ड, पुराना बस स्टैण्ड पर राणियां ठेलों में बिकने लग जाती है, लेकिन इस बार पानी की कमी तथा पेड़ों में चमकादड़ों के साए ने राणी के स्वाद को जकड़ लिया है। यह राणी फल बाजार में 100 रुपए प्रति किलो के भाव से बिक रहा है।
रखवाली हुई मुश्किल : बागवान सीताराम सैनी व अशोक महावर (सैनी) का कहना है कि पहले मेहनत के साथ अच्छी पैदावार भी होती थी, लेकिन अब वृक्षों की संख्या कम होने के साथ इनकी रखवाली करना मुश्किल है, पानी की कमी तथा गिने-चुने पेड़ों पर भी चमकादड़ों व अन्य जानवरों के नुकसान पहुंचाने से राणी फल की पर्याप्त पैदावार नहीं हो पाई है।
क्या है राणी
राणी का फल नीम की निमोली समान दिखाई देता है। यह कच्चा होने पर हरा रंग तथा पकने पर पीले रंग का हो जाता है। कच्ची राणी में दूध की मात्रा अधिक होती है। पकने पर पीले रंग की राणी का मिठास लोगों की पहली पसंद हो जाती है।
Published on:
11 May 2018 10:16 am
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