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आवां के पहाड़ी क्षेत्र में पिण्ड खजूर सहित अन्य फलदायी की खेती बनी प्रदेश में चर्चा का विषय

इनकी वृद्धि और फलोत्पादन के जादू को देखने के लिए आसपास सहित दूरदराज के लोगों की भीड़ उमड़ रही है।  

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 खजूर के पेड़

आवां के पास पहाड़ी क्षेत्र में फार्म हाउस पर दो वर्ष पूर्व लगाए खजूर के पेड़ ।

आवां. बागवानी के बेशकीमती मेहमान पौधों को अब टोंक जिले की धरा और आबोहवा रास आने लगी है। उत्कृष्टता केन्द्र और देवड़ावास स्थित अन्तरराष्ट्रीय नर्सरी में खजूर, किनवा, डे्रगन फ्रूट, सहेजना, ग्वार पाठा, मौसमी, चीकू, चन्दन जैसे बहुपयोगी और मूल्यवान पौधों के फलने-फूलने से किसानों की उद्यानिकी में रूचि बढ़ी है।

सहजन, जैतून, पिण्ड खजूर के साथ डे्रगन फ्रूट की सफलता की कहानी चर्चाओं में है। इसी तर्ज पर आवां के पहाड़ी क्षेत्र से सटे कृषि फार्मों में पिण्ड खजूर की खेती और इनके पौधों की वृद्धि लोगों के लिए कौतूहल का विषय बनी है। मेहमान पौधों के लहराते खेत, ग्रीन, पॉली, नेट हाउस, बून्द-बून्द सिंचाई परियोजना, सौर-ऊर्जा संयंत्र, खरपतवार, रोग नियंत्रण एवं यहां अपनाए जा रहे नवाचार किसानों के साथ विद्यार्थियों के लिए आकर्षण का केन्द्र बनते जा रहे हैं।


आवां निवासी पारस सैनी ने बताया कि परम्परागत फसलों के साथ उद्यानिकी खेती को अजमाया गया है। उसने फार्म हाउस पर दो वर्ष पूर्व सर्वाधिक कैलोरी देने वाले खजूर की बरही, खुनेजी, जामली, खदरावी, सगई, खलास और मेडजूल किस्मों के 125पौधों का रोपण किया था। ये पौधे दो वर्ष में ही औसतन 20 किलो से अधिक उत्पादन देने की क्षमता रखते हैं।

प्रथम वर्ष में ही इन पर फलों के गुच्छे लगने शुरू हो जाते हैं। इस वर्ष इनका विकास देखने लायक है। इनकी वृद्धि और फलोत्पादन के जादू को देखने के लिए आसपास सहित दूरदराज के लोगों की भीड़ उमड़ रही है। टोंक कृषि विस्तार के उपनिदेशक निरंजनसिंह राठौड़ ने बताया कि टोंक का भौगोलिक परिवेश उद्यानिकी पौधों के अनुकूल है।

तापमान, आद्रता और बारिश का स्तर इन बागवानी की फसलों को रास आ रहा है। बीमारियों से लडऩे की बेहतर क्षमता और न्यूनतम खर्च में अधिक मुनाफा देने के कारण किसानों का इस ओर रुझान बढ़ा है। इन फलों की देश-विदेश में अच्छी मांग होने से इसकी खेती किसान की आय बढ़ाने मे मददगार हो सकती है।


यहां किया है रोपण
कृषि विभाग की ओर से खजूर उत्कृष्टता केन्द्र, राजकीय फार्म सगरा-भोजका जैसलमेर एवं खारा बीकानेर के 130 हैक्टेयर में खजूर की विभिन्न किस्मों के 2194 पौधों का रोपण किया गया है। राजहंस नर्सरी सहित राज्य के अन्य उत्कृष्टता केन्द्रों पर भी इसके बगीचे लगाए गए हैं।

जलवायु भी अनुकूल
खजूूर की खेती अत्यधिक गर्मी, कम वर्षा और बहुत कम आद्रता वाले क्षेत्रों में कारगर है। तेज गर्मी, धूल और ठण्ड को सहने में सक्षम होने के कारण राजस्थान का पश्चिमी भाग इससे जबर्दस्त फलीभूत हो रहा है। जिले की जलवायु भी इसके अनुकूल है।

खजूर सेहत का खजाना
खजूर शुष्क जलवायु का प्राचीन फलदार वृक्ष है। इराक, सऊदी अरब, इरान, मिश्र, संयुक्त राज्य अमरीका और स्पेन इसके प्रमुख उत्पादक देश है। राजस्थान में इसके अभिनव प्रयोग किए जा रहे हैं। खून की कमी व नेत्रहीनता में इसका सेवन कारगर साबित हुआ है।

ये मिलता है अनुदान
खजूर के टिश्यू कल्चर के उत्पादित खेत में रोपित पौधों की लागत का 75 फीसदी (अधिकतम 1950 रुपए प्रति पौधा) अनुदान देय है। खजूर के पौधों में उर्वरक एवं कीटनाशी के प्रबन्ध के लिए तीन वर्षों में 8250 रुपए प्रति हैक्टेयर किश्तों में दिए जाने के प्रावधान हैं।

राज्य में खजूर की खेती की विपुल सम्भावनाओं को देखते हुए टिश्यू कल्चर प्रयोगशालाओं में इनकी पौध तैयार कराई जा रही है। संतरा, केन्नो, अनार, खजूर, आम, अमरूद, नींबू, प्याज, टमाटर, मटर, कद्दू, मिर्च, लहसुन, मैथी, धनिया, जीरा, ईसबगोल, सौंफ आदि बागवानी फसलों के भी कलस्टर विकसित किए जा रहे हैं। रेगिस्तानी धरती के मखमली धोरों के बीच भी इनके बेहद खूबसूरत फूल और फल अपने आकर्षण का चमत्कार बिखरेते नजर आने लगे हैं।
प्रभुलाल सैनी, कृषि मंत्री राजस्थान।