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वयोवृद्ध होता जा रहा है ऐतिहासिक टोंक

टोंक का स्थापना दिवस मनाएंगेगढ़ परिसर में पूजा के बाद होगी शुरुआतजलालुद्दीन खानटोंक. प्रेम का प्रतीक, मीठी भाषा और अदब का शहर टोंक वयोवृद्ध होता जा रहा है। इसकी स्थापना करीब एक हजार साल से भी अधिक समय पहले हुई। मुकम्मल इतिहास नहीं होने के बावजूद माना जाता है यह शहर 1075 साल पहले बसा था।

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टोंक

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Jalaluddin Khan

Dec 23, 2020

वयोवृद्ध होता जा रहा है ऐतिहासिक टोंक

वयोवृद्ध होता जा रहा है ऐतिहासिक टोंक

वयोवृद्ध होता जा रहा है ऐतिहासिक टोंक
टोंक का स्थापना दिवस मनाएंगे
गढ़ परिसर में पूजा के बाद होगी शुरुआत
जलालुद्दीन खान
टोंक. प्रेम का प्रतीक, मीठी भाषा और अदब का शहर टोंक वयोवृद्ध होता जा रहा है। इसकी स्थापना करीब एक हजार साल से भी अधिक समय पहले हुई। मुकम्मल इतिहास नहीं होने के बावजूद माना जाता है यह शहर 1075 साल पहले बसा था।

इतिहासकारों ने काफी खोजने का प्रयास किया, लेकिन चार सौ साल का इतिहास आज भी टोंक का नहीं है। ऐसे में जो इतिहास मौजूद है उसके मुताबिक टोंक शहर का 1075 वां स्थापना दिवस परम्परागत रूप से गुरुवार को पुरानी टोंक स्थित गढ़ परिसर में पूजा-अर्चना के बाद मनाया जाएगा।

इस दौरान आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि जिला कलक्टर गौरव अग्रवाल होंगे। अध्यक्षता जिला प्रमुख सरोज बंसल करेगी।

टोंक स्थापना महोत्सव समिति अध्यक्ष सुजीत सिंहल ने बताया कि कोविड-19 की गाइड लाइन के अनुसार आयोजित किए जा रहे समारोह में हनुमान सिंघल स्मृति संस्थान की ओर से शहर की 14 विभूतियों को टोंक रत्न से सम्मानित किया जाएगा।

गौरतलब है कि टोंक में रसिकमल और उनकी प्रेम कथा कही जाती है। इसकी निशानी रसिया की छतरी है। इसी प्रकार प्रेम की निशानी पुरानी टोंक में रजिया सुल्ताना और याकूत की मजार के भी दावे भी किए जाते हैं।

इधर, इतिहास के मुताबिक टोंक शहर राजस्थान के निर्माण से पूर्व नवाबों की रियासत था। जिस पर अमीर खां के वंशज शासन करते थे। विक्रम सम्वत् 1003 तदनुसार दिल्ली के तंवर तुंगपाल के चाचा क्षेत्रपाल अपने भतीजे से अप्रसन्न होकर इस स्थान पर (जहां आज टोंक स्थित है) चले आए यहीं उन्होंने अपना जमावड़ा जमा लिया।


कुछ वर्षों के बाद तुंगपाल ने अपनी ओर से सरदार ख्वाजा रामसिंह को ढूंढ़ार का प्रबन्ध करने के लिए भेजा। ख्वाजा रामसिंह का पड़ाव यहां कई दिनों तक रहा। ख्वाजा रामसिंह ने चाचा भतीजे का समझौता करा दिया और वापस दिल्ली चले गए।

तंवर खेमपाल ने इस स्थान पर महलों का निर्माण करवाया, जिनके खण्डहर वर्तमान में पुरानी टोंक में तमोलियों के मोहल्ले में स्थित है।

इसके बाद सम्वत 1337 विक्रम तदनुसार 1218 ईसवी में, भारत पर अलाउद्दीन खिलजी का शासन था। एक युद्ध के बाद गुजरात के सोलंकी इस ओर आ गए और चौहान राजा सातू से टोंक और टोडा के सूबे छीन लिए।

सम्वत् 1459 विक्रम में राव डूंगरजी सोलंकी टोंक व टोडा के राजा थे। उन दिनों लल्लन खां पठान ने राव से टोडा छीन लिया। राव डूंगरजी ने चितौड़ के राणारायमल और गागरोन खींची राजा पीपाजी के सहयोग से लल्लन खां पठान पर आक्रमण कर दिया और मौत के घाट उतार दिया।

राव डूंगरजी ने टोडा का राज्य अपने ज्येष्ठ पुत्र रतनसिंह को तथा छोटे पुत्र जोगाजी को टोंक सूबा दे दिया। राव जोगाजी के काल में ही टोंक का विस्तार हुआ। पुरानी टोंक का कोट बनवाया। इसमें मेहंदवास गेट, निवाई गेट, मालपुरा गेट, पंचकुइया दरवाजा, बमोर गेट, भोम गढ़, चतुर्भुज तालाब शामिल है।

इसके अलावा गढ़, माता मंदिर आदि शामिल है। अपने पुत्र माणक की स्मृति में 'माणक चौकÓ बनवाया। जिसका उपयोग जोगाजी अपनी सेना के प्रदर्शन कार्य के लिए करते थे। सोलंकी वंशज व गढ़ परिवार सदस्य हनुमानसिंह सोंलकी ने बताया कि राव जोगाजी के बाद पुरुषोत्तम दास, कल्याण सिंह, जगन्नाथ सिंह, भाव सिंह, कर्मचंद, जयसिंह, नथन सिंह, शम्भूसिंह, लालसिंह, दीपसिंह, ज्ञानसिंह, चन्द्रसिंह, नृसिंह टोंक में शासक रहे। राजस्थान एकीकरण के समय जागीरदार हनुमान सिंह सोलंकी के पिता ईश्वर सिंह सोलंकी थे। ईश्वरसिंह के भाई हुकम सिंह सोलंकी स्वतंत्रता सैनानी थे। हुकम सिंह को भारत सरकार की ओर से ताम्रपत्र भी दिया गया था।


दूसरी ओर टोडा के राव रतनसिंह की मृत्यु के बाद सूरसेन, पृथ्वीराज, रामचंद्र, पुरुषोत्तम, कल्याण, भगवानदास और जगन्नाथ टोडा के राजा हुए। सम्वत् 1863 (नवम्बर 1817) को टोंक का सूबा अमीर खां को मिल गया, जो नवाबी रियासत के प्रथम नवाब थे।