
टोंक। टोंक के बहीर क्षेत्र के जंगलों में खुले आसमान के नीचे डेरा डालकर पिछले 50 वर्षों से 30 परिवारों का कबीला रह रहा है। नाम पूछने पर शाह जाति का यह कबीला मुस्लिम लगता है लेकिन यहां सुबह-शाम हिन्दू देवी-देवता की पूजा होती है। इस कबीले में सात फेरे लेकर विवाह किया जाता है लेकिन मृत्यु होने पर मुस्लिम रिवाज से शव को दफनाया जाता है।
खुले आसमान के नीचे डेरा
कबीले के लोग अपने आपको राजस्थान का ही बताते हैं। इनके पूर्वज अन्य राज्यों में भी बसे हैं। चाहले गर्मी हो या सर्दी या बरसात यह कबीला खुले आसमान के नीचे डेरा डालकर रहता है। ये लोग देश के कोने-कोने में फेरी लगाकर जड़ी बूटियों से लकवा, दाद, दमा, गठिया व घुटने के रोगों का इलाज करना इनका पुश्तैनी काम है।
शादी में नहीं लेते दहेज
कबीले में जब शादी होती है लडक़ी वालों से कोई दहेज नहीं लिया जाता। मंगनी के बाद से ही लडक़ी का खर्च भी लडक़े को ही उठाना पड़ता है। दुल्हा-दुल्हन की शादी के समय एक चबूतरा बनाकर उस पर सुपारी रख देते हैं, उसके बाद सात फेरे लेकर एक-दूसरे के जीवनसाथी बन जाते हैं।
संगमरमर से बनाते हैं कब्र
कबीले के शेरू शाह का कहना है कि जीते जी तो उन्हें सिर छिपाने के लिए छत नसीब नहीं होती लेकिन मृत्यु के बाद पक्के मकान की तरह उनकी कब्र बनाते हैं। कबीले के लोगों का अलग ही कब्रिस्तान है। कबीले के किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसे मुस्लिम रीति-रिवाज अनुसार दफनाया जाता है। दफनाने के बाद उसकी कब्र को संगमरमर व कीमती टाइल्स से सजाया जाता है। इसमें हजारों रुपए का खर्चा आता है।
Published on:
30 Oct 2017 03:18 pm
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