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यूं जलेंगे परंपराओं के दीप…लक्ष्मीजी के घर आने के साथ ही दूर होता है आलस्य

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यूं जलेंगे परंपराओं के दीप...लक्ष्मीजी के घर आने के साथ ही दूर होता है आलस्य

धीरेंद्र् जोशी/उदयपुर . दीपोत्सव उजालों, उमंग और श्रद्धा का पांच दिवसीय पर्व सोमवार से शुरू हो रहा है। इसको लेकर पिछले कई दिनों से लोग तैयारियों में जुटे हुए हैं। दीपावली को लेकर हर जगह की कुछ न कुछ अलग परंपराएं रही है। मेवाड़ में भी एेसी ही कुछ परंपराएं है, जिन्हें आज भी निभाया जाता है।उदयपुर में दीपोत्सव पर चार दिन तक लगातार लक्ष्मीजी के दर्शन करने की परंपरा है।इन चार दिनों में लाखों श्रद्धालु भट्टियानी चौहट्टा स्थित एेतिहासिक लक्ष्मीजी मंदिर में दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं। इनमें छोटे से लेकर बड़े सभी तबकों के लोग यहां पहुंचते हैं। साथ ही मंदिर में जहां श्रीमाली जाति-सम्पत्ति व्यवस्था ट्रस्ट की ओर से पूजा-अनुष्ठान, मंदिर की सजावट आदि की व्यवस्था की जाती है। मंदिर के बाहर की व्यवस्थाएं दीपोत्सव समिति संभालती है। मंदिर में सुबह से शाम तक बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़ते हैं।


दीपों से जगमग होता है लक्ष्मीजी का आंगन


दीपोत्सव के दौरान प्रतिदिन शाम को लक्ष्मीजी मंदिर का आंगन दीपों से जगमगा उठता है। मंदिर के आसपास की महिलाएं संध्या के समय घरों में दीपक जलाकर रोशनी करती है। बाद में लक्ष्मीजी के दर्शन करने मंदिर पहुंचती है और मंदिर के आंगन में भी शगुन का दीपक जलाती है। एेसे में मंदिर का आंगन दीपक से जगमग हो उठता है।


पूर्व राजघराना भी पहुंचता है दर्शनार्थ

महालक्ष्मीजी के दर्शन के लिए पूर्व राजघराने के अरविंदसिंह मेवाड़ और उनका परिवार भी पहुंचता है। वे मंदिर में दर्शन के पश्चात मेवाड़ भट्टियानी चौहट्टा क्षेत्र में भ्रमण कर पुन: महल लौटते हैं।

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थाली बजाकर लक्ष्मीजी का स्वागत
श्रीमाली जाति-सम्पत्ति व्यवस्था ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष मधुसूदन श्रीमाली ने बताया कि दीपोत्सव के अंतिम दिन खेखरे के दिन को लेकर यह मान्यता है कि दीपावली की रात को माता लक्ष्मीजी घर-घर पधारती है। एेसे में मेवाड़ के अधिकतर घरों में महिलाएं अलसुबह उठ जाती है। घर का कचरा निकालने के साथ ही उसे घर के बाहर रोड़ी पर डाला जाता है। कचरे के समीप दीपक जलाने के बाद वही से थाली बजाते हुए घर में प्रवेश करते हैं। घर के प्रत्येक कमरे में थाली बजाई जाती है। घर में लक्ष्मीजी के सम्मुख भी दीपक किया जाता है। इसके बाद परिवार सहित महालक्ष्मीजी के मंदिर दर्शन करने के लिए जाते हैं। कुछ समाज में यह भी परंपरा है कि चकरे के साथ ही घर की पुरानी मटकी को भी रोड़ी पर ही रख दिया जाता है और नई मटकी निकाली जाती है।