
चन्दनसिंह देवड़ा/उदयपुर . न केवल स्टेशनरी बल्कि यूनिफॉर्म में भी निजी स्कूल संचालकों व दुकानदारों की सांठगांठ अभिभावकों की जेब काट रही है। यहां भी कमीशन का गोरखधंधा चल रहा है। पत्रिका टीम दूसरे दिन गुरुवार को यूनिफॉर्म की दुकानों पर स्कूल संचालक बनकर स्टिंग करने पहुंची तो चौंकाने वाले खुलासे हुए। कड़वी हकीकत सामने आई कि निजी स्कूलों में अध्ययनरत विद्यार्थियों की यूनिफॉर्म की आड़ में कमीशन का धंधा भी प्रतिवर्ष करोड़ों के पार जा रहा है। दुकानदारों से स्कूल संचालक और स्कूल संचालकों से दुकानदार बनकर बातचीत की तो दलाली के इस खेल की परत-दर-परत खुलती गई। यूनिफॉर्म में 15 से 20 प्रतिशत कमीशन की बात सामने आई है।
इधर...परेशान अभिभावकों ने पत्रिका से कहा- शिक्षा विभाग में शिकायतें कर थक चुके हैं। पत्रिका टीम की ओर से किए गए स्टिंग को लेकर गुरुवार को सैकड़ों अभिभावकों ने अपनी पीड़ा व्यक्त की। अभिभावकों ने बताया कि निजी स्कूल बिना लगाम के घोड़े बन गए हैं। शिक्षा विभाग के अधिकारियों का यह तर्क भी नकारा की अभिभावक लिखित में शिकायत नहीं करते हैं। अभिभावकों के अनुसार उन्होंने जिला कलक्टर से लेकर शिक्षा विभाग में लिखित पीड़ा बताई लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही है।
निजी स्कूलों की ओर से किताबों, डे्रस और स्टेशनरी को लेकर की जा रही मनमर्जी को लेकर अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत ने कार्रवाई की मांग की है। जिलाध्यक्ष रमेश सोनार्थी की अध्यक्षता में हुई जिला शाखा की बैठक में निर्णय किया गया कि विभिन्न संगठनों के साथ मिलकर कलक्टर से मिलेंगे। प्रान्तीय संगठन मंत्री राकेश पालीवाल ने बैठक में कहा कि निजी विद्यालयों में भारी भरकम शुल्क राशि लेने के बाद भी अभिभावकों को होमवर्क कराने के लिए बच्चों को ट्यूशन करानी पड़ती है जिससे अभिभावकों पर दोहरी मार पड़ रही है। बैठक में मांगीलाल भोई, गिरिराज सालवी, सत्यनारायण प्रजापत, भंवरसिंह अखेपुर, हरिशंकर तिवारी, रमेश जोशी समेत कई लोग मौजूद थे।
पहले डिजाइन फिर कमीशन की बात
स्कूल यूनिफॉर्म में मौजे, शूज, पेंट-शर्ट, स्कर्ट, टाई, स्वेटर, ब्लेजर में कमीशन का खेल चल रहा है। शहर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में जगह-जगह इसके ठौर हैं। स्कूल से आने का नाम लेते ही कैटलॉक सामने रख दिया जाता है। यूनिफॉर्म की डिजाइन तय होने के बाद चलता है कमीशन तय करने का खेल, जिसमें कोई 15 तो कोई 20 फीसदी में राजी हो रहा है। यह कमीशन अभिभावकों की ओर से खरीदी जाने वाली सामग्री में दर बढ़ाकर जोड़ा जाता है।
यहां दुकानदार ने सिखाया मुनाफा कमाना
शहर के एक व्यापारी से यूनिफॉर्म का ऑर्डर बुक कराने पहुंचे तो करीब एक घंटे तक बातचीत हुई। उन्होंने कई विद्यालयों से बंधे कमीशन को स्वीकारा। उन्होंने यूनिफॉर्म के ठेके एवं कमीशन के दो विकल्प बताए। पहला-यहीं पर स्टॉक रखवाकर अभिभावकों को बेचने का तो दूसरा- अपने स्कूल में सामग्री ले जाकर वितरण। व्यापारी ने स्पष्ट कहा कि हम प्रति ड्रेस सीमित मात्रा में कमीशन दे देंगे, लेकिन आप यदि अपने स्तर पर इसकी बिक्री करते हो तो मुनाफा बढक़र 25 फीसदी भी पहुंच सकता हैं, यह आपके अपने स्तर का मामला है।
ऐसे तय करते हैं दरें
एक व्यापारी ने शहर के 35 विद्यालयों की सप्लाई की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यूनिफॉर्म की राशि साइज नंबर के साथ तय होती हैं। ऑर्डर पर 20 नंबर से 42 नंबर तक के यूनिफॉर्म कक्षावार तैयार करते हैं, साइज बढऩे के साथ ही दर में बीस से तीस रुपए की बढ़ोतरी हो जाती हैं। यूनिफॉर्म की डिजाइन तय करने के बाद व्यापारी ने आगे बढक़र एक नया कमीशन का विकल्प सुझाया। उनका कहना था कि यह तो प्रतिदिन की यूनिफॉर्म हुई है। मंगलवार व शनिवार को लोवर- टी शर्ट भी आप रख सकते हो, जिस पर अच्छा कमीशन मिल जाएगा।
सब कुछ दिख रहा, अंधे बनने का नाटक
मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी शिवजी गौड़ से जब निजी स्कूलों की मनमर्जी को लेकर बात की तो जवाब मिला कि मेरे पास अभिभावक लिखित में शिकायत करें, अभी तक किसी ने शिकायत नहीं की है। बिना शिकायत के मैं कुछ नहीं कर सकता जबकि कई अभिभावकों ने बताया कि उन्होंने शिकायतें कर रखी है।
अभिभावकों ने यों बताई पीड़ा
- कुछ स्कूल तो परिसर में किताबें बेच रहे है कुछ ने बाहर दुकाने लगा दी। तीन दुकानों के नाम बता एक ही दुकान पर किताबें बिक रही है।
- कुछ ने चेक से पेमेंट लिया लेकिन किसके खाते में पैसा जाएगा यह नहीं लिखा।
- कहीं पर तो बिना बिल के किताबें दे रहे है। आरटीई में प्रवेश लेने वालों से भी बाजार से किताबें मंगवाई जा रही है जबकि उन्हे स्कूल से किताब देनी है।
- पाठ्यक्रम में शामिल किताबों की सूची तक नहीं दी जा रही है केवल रकम बताकर अकांउट पे चेक लिया जा रहा है।
- एक स्कूल संचालक ने तो स्कूल परिसर के बाहर एक बुक्स वेंडर को बिठा दिया जो किताबों के महंगे सेट बेच रहा है। नोट बुक भी स्कूल का नाम प्रिंट वाली ही बच्चों से खरीदवाई जा रही है।
- एक स्कूल संचालक ने रिश्तेदारों की दुकानें खुलवा दी और वहां अभिभावकों को जाने को मजबूर किया जा रहा है।
- एक स्कूल में बच्चों का बीमा करने के नाम पर 340 रुपए लिए लेकिन कोई पॉलिसी डॉक्यूमेंट नहीं दे रहे।
- किसी ने चौथी कक्षा की फीस 3800 कर दी जबकि तीसरी में 3200 थी। रेट कार्ड में ऐसा खेल कर रखा है कि अभिभावक गुमराह हो जाते है।
- किताबों के बिल भी नहीं दे रहे हैं।
Published on:
05 Apr 2019 04:49 pm
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