
गुडली वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट
उदयपुर. पर्यावरण की सुरक्षा केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति को नुकसान पहुंचाने वाले खतरनाक औद्योगिक कचरे का वैज्ञानिक नियमों के तहत सुरक्षित निस्तारण करना भी इसका बड़ा हिस्सा है। इस दिशा में उदयपुर जिला पूरे देश के लिए नजीर पेश कर रहा है। उदयपुर के गुडली गांव स्थित राजस्थान की पहली और सबसे बड़ी हेजार्डियस वेस्ट मैनेजमेंट साइट आज उद्योगों से निकलने वाले खतरनाक कचरे के उपचार के लिए देश के सर्वश्रेष्ठ मॉडल के रूप में काम कर रही है।जहां आमतौर पर देश के अन्य राज्यों में ऐसी साइट्स के आस-पास के गांवों में भूजल और कृषि भूमि पर विपरीत प्रभावों का खतरनाक स्तर देखने को मिलता है, वहीं गुडली स्थित इस प्लांट को अपनी उत्कृष्ट और सुरक्षित व्यवस्था के लिए राष्ट्रीय स्तर पर 'बेस्ट प्राइज' से नवाजा जा चुका है।
यों शुरुआत हुई प्रोजेक्ट की?
प्रोजेक्ट प्रबंधन संभालने वालीं डॉ. साक्षी जैन बताती हैं कि वर्ष 2006 में 'उदयपुर चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री' (यूसीसीआइ) ने पर्यावरण संरक्षण के इस बड़े प्रोजेक्ट का जिम्मा अपने हाथों में लिया था। इसके लिए राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने करीब 50 बीघा जमीन उपलब्ध कराई थी।
इसके बाद राजस्थान भर के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाले खतरनाक कचरे का यहां वैज्ञानिक निस्तारण शुरू हुआ। इस प्लांट के संचालन और तकनीकी कार्यों की जिम्मेदारी पर्यावरण इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र की कंपनी रामकी को दी गई। वर्तमान में राजस्थान के विभिन्न इंडस्ट्रियल जोन से पूरी तरह सुरक्षित, एयर-पैक्ड और लीक-प्रूफ ट्रकों के जरिये खतरनाक कचरा यहां लाया जाता है।
पर्यावरण फर्स्ट पॉलिसी से मिला ग्रामीणों का साथ
प्लांट संयोजक कोमल कोठारी के अनुसार पिछले दो दशक में इस प्लांट को स्थानीय स्तर पर विरोध या शिकायतों का सामना नहीं करना पड़ा। इसका मुख्य कारण प्रबंधन की ओर से लागू की गई सख्त पर्यावरण फर्स्ट पॉलिसी है। स्थानीय समुदाय के साथ समन्वय बनाए रखने के लिए हर तीसरे महीने में ट्रस्ट की बैठक होती है, जिसमें ग्रामीण और रहवासियों की समस्याओं को प्रबंधन के सामने रखते हैं।
हम केवल मापदंड तय नहीं करते, बल्कि उनका कड़ाई से पालन भी सुनिश्चित करते हैं। हमारी टीम समय-समय पर आस-पास के गांवों में जाकर ग्राउंड वाटर और खेतों की मिट्टी के सैंपल लेती है। लैब टेस्टिंग में पानी या मिट्टी में केमिकल या हैवी मेटल्स (भारी धातुओं) का कंटेमिनेशन (प्रदूषण) नहीं पाया गया है।
कोमल कोठारी, संयोजक
महिला शक्ति ने पेश की मिसाल
यह प्रोजेक्ट न केवल पर्यावरण बल्कि सामाजिक सरोकार का भी केंद्र बन चुका है। वर्तमान में इस प्लांट में 60 लोग कार्यरत हैं, जिनमें से 40 कर्मचारी स्थानीय गांवों से ही हैं। इनमें भी 70 फीसदी महिलाएं हैं, जो इस प्लांट के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। प्लांट अब तक साढ़े 5 लाख टन से अधिक खतरनाक कचरे का सुरक्षित निस्तारण कर चुका है और हर साल यहां औसतन 60 हजार टन कचरा डिस्पोज किया जाता है।
कैसे होता है कचरे का निस्तारण?
इस प्लांट में मुख्य रूप से फार्मास्युटिकल (दवा), केमिकल और मेटलर्जिकल उद्योगों से निकलने वाला खतरनाक कचरा आता है, जो सूखे या सेमी-सॉलिड फॉर्म में होता है। अत्यधिक जहरीला होने के कारण इसे खुले में छोड़ना जानलेवा हो सकता है। इसके निस्तारण के लिए निम्न वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग किया जाता है:
इंसिनरेशनः कचरे को जलाने के लिए प्लांट में 800 से 1000 डिग्री सेल्सियस क्षमता वाली अत्याधुनिक भट्टी स्थापित है। इस उच्च तापमान पर कचरे को जलाकर खतरनाक केमिकल्स को सुरक्षित राख में तब्दील कर दिया जाता है, जिससे हवा में हानिकारक तत्व नहीं फैलते।
सिक्योर डंपिंग: जलने के बाद बची राख और नॉन-इंसिनरेबल वेस्ट को वैज्ञानिक तरीकों से तैयार गड्ढों में डाला जाता है। इन गड्ढों को विशेष जियो-मेम्ब्रेन और लेयर्स से इस तरह वाटर-प्रूफ और लीक-प्रूफ बनाया जाता है कि कचरे का कोई भी अंश रिसकर जमीन के अंदरूनी पानी तक न पहुंच सके।
रजिस्ट्रेशन के बिना नहीं शुरू हो सकते उद्योग
यूसीसीआइ ने इस पूरे कचरा प्रबंधन की कड़े स्तर पर मॉनिटरिंग के लिए उदयपुर इंडस्ट्रियल वेस्ट मैनेजमेंट एंड रिसर्च सेंटर का गठन किया है। इस सेंटर की सख्ती और नियम इतने मजबूत हैं कि इस रीजन के तहत आने वाले जिलों में कोई भी हेजार्डियस वेस्ट (खतरनाक कचरा) उत्पन्न करने वाला उद्योग तब तक अपना प्लांट शुरू नहीं कर सकता, जब तक वह इस सेंटर से आवश्यक रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट प्राप्त नहीं कर लेता।
Published on:
05 Jun 2026 06:15 pm
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