4 जून 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

कागजों में ‘क्लाइमेट रेडी’, हकीकत में ‘कंक्रीट का जंगल’: पर्यावरण दिवस से पहले उदयपुर के ‘हीट एक्शन प्लान’ की खुली पोल

उदयपुर का हीट वेव एक्शन प्लान 2026 कागजों में मजबूत दिखाई देता है, लेकिन जमीनी स्तर पर कई महत्वपूर्ण मानकों पर व्यवस्थाएं नाकाफी हैं। शहर के प्रमुख बाजारों में कूलिंग पॉइंट्स नहीं हैं, कचरा प्रबंधन और रेन वॉटर हार्वेस्टिंग की स्थिति कमजोर है, जबकि कंक्रीट निर्माण लगातार बढ़ रहे हैं। विश्व पर्यावरण दिवस से पहले हुई पड़ताल में सामने आया कि जलवायु चुनौतियों से निपटने के लिए शहर को अभी और ठोस कदम उठाने की जरूरत है।

2 min read
Google source verification
udaipur city

file photo

उदयपुर. बढ़ते तापमान और भीषण गर्मी की चुनौतियों से निपटने के लिए उदयपुर जिला प्रशासन ने हीट वेव एक्शन प्लान 2026 के तहत अपनी तैयारियों का खाका तैयार किया है। उच्च स्तरीय बैठक में चिकित्सा, शिक्षा, जल आपूर्ति और नगर निगम जैसे प्रमुख विभागों को विशिष्ट जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं। विश्व पर्यावरण दिवस से पहले इन मानकों के आधार पर पत्रिका ने इन दावों की पड़ताल की।

प्रशासन के प्रमुख दावे: क्या है एक्शन प्लान?

जिला प्रशासन के आदेशानुसार, गर्मी से बचाव के लिए सभी विभागों ने मिलकर रणनीति बनाई है:

इमरजेंसी हेल्थ अलर्ट: अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों को निर्देश दिए गए कि वे हीट स्ट्रोक के मरीजों के लिए विशेष वॉर्ड और दवाओं का स्टॉक तैयार रखें।

पेयजल एवं बिजली: पीएचईडी और विद्युत वितरण निगम को निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के आदेश दिए गए हैं, ताकि गर्मी में जनता को दोहरी मार न झेलनी पड़े।

श्रमिक सुरक्षा: श्रम विभाग को निर्माण स्थलों पर काम करने वाले मजदूरों के लिए वर्किंग ऑवर्स और सुरक्षा नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी दी गई है।

शिक्षा संस्थानों में बदलाव: स्कूलों और कॉलेजों में बच्चों को लू से बचाने के लिए समय और सुविधाओं में बदलाव के निर्देश दिए गए हैं।

क्लाइमेट रेडी सिटी: किसी भी शहर को जलवायु परिवर्तन के प्रति तैयार मानने के लिए 7 प्रमुख मापदंड तय किए गए हैं।

हमने उदयपुर की इन्हीं बिन्दुओं पर पड़ताल की

दावों और पड़ताल का विवरण हीट एक्शन प्लान की नीति: प्रशासन का दावा है कि भीषण गर्मी से निपटने के लिए व्यापक नीति और हीट एक्शन प्लान तैयार है, जिसकी पड़ताल इस आधार पर की जानी चाहिए कि क्या यह योजना केवल कागजों तक सीमित है या धरातल पर सक्रिय रूप से क्रियान्वित भी है।

सार्वजनिक कूलिंग पॉइंट्स: सार्वजनिक स्थानों पर प्याऊ और ठंडे पानी की व्यवस्था प्रशासन की ओर से की गई है। लेकिन इसी बीच पर्यटन सिटी में मुख्य और भीड़भाड़ वाले बाजारों में एक भी पब्लिक कूलिंग पॉइंट नहीं है।

जल निकायों का संरक्षण: प्रशासन की ओर से जल निकायों के संरक्षण के लिए गंगा जल संवर्धन अभियान शुरू किया गया है। इसके साथ पत्रिका के अमृतं जलम् अभियान के तहत शहर की ऐतिहासिक बावड़ियों और तालाबों की सफाई और संरक्षण किया जा रहा है।

आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं: चिकित्सा विभाग ने अस्पतालों में विशेष वॉर्ड और पर्याप्त दवाओं की उपलब्धता का दावा किया है। एम.बी. अस्पताल और अन्य केंद्रों में एसी या कूलर युक्त हीट स्ट्रोक वॉर्ड संचालित किए जा रहे हैं। इसके लिए कुछ बेड आरक्षित किए गए हैं।

कचरा प्रबंधन: कचरा निस्तारण की स्थिति गंभीर है। शहर में गीला- सूखा कचरा अलग- अलग आने की बजाय एक साथ इकट्ठा किया जा रहा है। शहर से जितना कचरा इकट्ठा हो रहा है, उसके निस्तारण के लिए डंपिंग यार्ड ही नहीं है। शहर के मुख्य गुलाब बाग के पास सड़क पर बनी हवेली में ही लोग कचरा फेंक रहे हैं और उसी में आग लगा देते हैं। दूसरी जगहों पर भी खुले में कचरा जलाया जा रहा है, जिससे स्थानीय तापमान में बढ़ोतरी होती है।

रेन वॉटर हार्वेस्टिंग: जल संचयन के नियमों और उनकी प्रभावशीलता के दावे हवा-हवाई हैं। कुछ नए सरकारी भवनों और शहर में हो रहे नए निर्माणों में से सिर्फ 20 प्रतिशत में रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम है। जिन नए निर्माणाें में यह तकनीक नहीं लगाई जा रही उनके लिए प्रशासन के पास कोई ठोस एक्शन प्लान नहीं है।

शहरी वनीकरण: पेड़ लगाने की बजाय लेकसिटी की जीवन रेखा अरावली और झीलों के आस-पास धड़ल्ले से निर्माण हो रहे हैं। कंक्रीट के जंगल खड़े किए जा रहे हैं।