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राजस्थान के पिटारे में बंद देववाणी की ज्ञानधारा

ना सांध्य स्कूल खुले, ना अनौपचारिक केन्द्र मूर्त रूप नहीं ले पाई अनौपचारिक शास्त्र शिक्षण केन्द्र योजना
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राजस्थान के पिटारे में बंद देववाणी की ज्ञानधारा

राजस्थान के पिटारे में बंद देववाणी की ज्ञानधारा

भुवनेश पण्ड्या

उदयपुर. व्यापक प्रचार-प्रसार व व्यावहारिकता के अभाव में सरकार की ओर से शुरू की गई अनौपचारिक शास्त्र शिक्षण केन्द्र योजना और सांध्य स्कूल खोलने की योजना धरातल पर नहीुं उतर पाई है। इससे शिक्षा समृद्ध करने की मंशा सरकार की पूरी नहीं हो पा रही। आलम यह है कि न तो राज्य में संस्कृत के सांध्य स्कूल खुले और ना ही एक भी अनौपचारिक केन्द्र की शुरुआत हुई। एक तो मौजूदा सरकार ने पैसा देने में हाथ तंग कर दिए वहीं पूर्ववर्वी सरकार के सपने को ये सरकार पूरा करने का मन ही नहीं बना पाई है।

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यह थी योजना

पूर्ववर्ती सरकार की ओर से राज्य में शास्त्रों के संरक्षण एवं प्रदेश में संस्कृत विद्वानों के ज्ञान से युवा पीढी व जन सामान्य को लाभान्वित कराने के उद्देश्य से अनौपचारिक शास्त्र शिक्षण केन्द्र शुरू करने की योजना लेकर आई थी। इसी प्रकार जन सामान्य को भारत की समृद्ध संस्कृति से अवगत कराने के लिए सांध्य विद्यालय शुरू करने की योजना बनाई गई थी। वित्तीय एवं भौतिक संसाधनों के अभाव में इन योजनाओं के कागज तो खूब दौड़ते रहे, लेकिन ये धरातल पर नहीं उतरी।

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ऐसे होता रहा पत्र व्यवहार:- 16 जून, 2016 को तत्कालीन उप शासन सचिव आभा बेनीवाल ने संस्कृत शिक्षा निदेशक को पत्र लिखकर अनौपचारिक शास्त्र शिक्षण केन्द्र के लिए बजट का विभागीय प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए थे।- तत्कालीन संस्कृत शिक्षा निदेशक विमलकुमार जैन ने 16 नवम्बर, 2016 को राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के कुलपति को पत्र लिखकर जानकारी दी थी कि राजस्थान में अनौपचारिक शास्त्र शिक्षण केन्द्रों की स्थापना की जानी है, इसका संचालन राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली की ओर से संचालित अनौपचारिक संस्कृत शिक्षण केन्द्रों की तर्ज पर होना है। इसे लेकर कुलपति से जैन ने बजट प्रस्ताव का मार्गदर्शन केन्द्र का बजट विवरण उपलब्ध करवाने का आग्रह किया था।- 5 अक्टूबर, 16 को तत्कालीन उप शासन सचिव आभा बेनीवाल ने निदेशक को पत्र लिखकर सांध्य विद्यालय संचालन से जुड़ा प्रस्ताव मांगा था।

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व्यावहारिक रूप से इसे शुरू नहीं कर पाए। स्कूल या कॉलेज में दो कालांश पढ़ाए जाने थे, लेकिन इसके लिए लोग भी पढऩे के लिए आगे नहीं आए। व्यापक प्रचार-प्रसार की भी जरूरत थी। यदि आवेदन आते तो वर्तमान में चल रहे स्कूल कॉलेजों में इसे शुरू किया जाना था। बजट से सब कुछ नहीं होता है। मूर्त रूप देने के लिए योजना भी व्यावहारिक होनी चाहिए।डॉ. कमलकिशोर चोटिया, संभागीय संस्कृत शिक्षा अधिकारी, उदयपुर