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इस ऐतिहासिक बावड़ी की नहीं हुई सार-संभाल तो हमेशा के लिए खो जाएगा इसका नामोन‍िशां

- तत्कालीन महाराणा राजसिंह के शासन में हुआ था निर्माण

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इस ऐतिहासिक बावड़ी की नहीं हुई सार-संभाल तो हमेशा के लिए खो जाएगा इसका नामोन‍िशां

शुभम कड़ेला/मावली. मेवाड़ के इतिहास एवं उदयपुर जिले में प्रमुख स्थान रखने वाले नगरों में मावली नगरी ऐतिहासिक, व्यापारिक एवं राजनीतिक महत्व से महत्वपूर्ण है। मध्यकाल में मोहाली के नाम से पहचान रखने वाले मावली कस्बे को मेवाड़ के महाराणा राजसिंह ने राजकुमारी चांदकुंवर को दहेज में दिया था। इसके बाद महाराणा ने बाईजी अर्थात राजकुमारी की सुविधा के मद्देनजर मावली कस्बे में एक बावड़ी का निर्माण कराया था, जो बाद में बाईजी राज की बावड़ी के नाम से प्रसिद्ध हुई। मगर इसी, प्रसिद्ध एवं प्राचीन बावड़ी की वर्तमान हालत दयनीय बनी हुई है। प्रशासनिक अमला भी इस बावड़ी के कायाकल्प व संरक्षण को लेकर उदासीन बना हुआ है। बावड़ी एवं इसके आसपास गंदगी पसरी हुई है। बावड़ी में छोटे-मोटे अनावश्यक पौधे उग आए हैं। कूड़े करकट का ढेर जमा हुआ है। समस्या से बावड़ी की सुन्दरता दांव पर है। कई बार इसके संरक्षण की उठी बात, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। गौरलतब है कि बावड़ी का निर्माण विक्रम संवत 1680 में हुआ था। बावड़ी की छतरियां भी क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। प्राचीन बावड़ी में कई शिलालेख भी स्थापित हैं तथा प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय इतिहास भी है।

नहीं हुई सुनवाई
कस्बेवासियों की मानें तो बाईजी राज की बावड़ी के संरक्षण को लेकर कई बार आमजन ने आवाज उठाई। कई बार मौखिक तो कई बार लिखित में ज्ञापन देकर बावड़ी को उपयोगी बनाने पर जोर दिया गया। लेकिन, हमेशा की तरह मौके पर प्रशासन एवं जनप्रतिनिधियों की ओर से केवल और केवल आश्वासन ही मिला। क्षेत्र के लोगों ने मावली के इतिहास के तहत प्राचीन बावड़ी को जीवंत रखने की बात कही है। हर स्तर पर बावड़ी के कायाकल्प को भी जोर दिया जा रहा है।

रोगियों को राहत

खास यह है कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के समीप स्थित इस बावड़ी से मरीजों को भी राहत मिल सकती है। बड़ी तादाद में उपचार के लिए आने वाले मरीजों के लिए बावड़ी के पानी की सुविधा का उपयोग बगीचा डवलप करने में किया जा सकता है। मरीजों को प्राकृतिक वातावरण से राहत मिल सकती है।


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