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परमसुख और परम आनंद की प्राप्ति करनी है तो भीतर जाकर स्वयं की आत्मा में करें रमण आचार्य श‍िव मुनि

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jain samaj

स्वयं की आत्मा में करें रमण

उदयपुर. महाप्रज्ञ विहार में आचार्य शिव मुनि ने कहा कि जिसे जीव और अजीव का भेद समझ में आ गया। समझो उसके जीवन में धर्म आ गया। परमात्मा की वाणी हर घड़ी हर पल बरसती है, लेकिन उसे ग्रहण करने का जितना बड़ा संयम रूपी पात्र होगा उतना ही आप ग्रहण कर पाओगे। उस वाणी को इकटठा कर पाओगे। उन्होंने कहा कि आप परमात्मा की वाणी, प्रवचन सुनते एवं शास्त्र पढ़ते हैं, लेकिन उसे स्वयं में जीते नहीं हैं। उसे आत्मसात नहीं करते हैं। आपने संसार के क्षणिक सुख को ही परमसुख मान रखा है। उसमें ही आप परम आनंद की अनुभूति करते हैं। हकीकत में ये मिथ्या है। सिर्फ धर्म ही सत्य है। यदि आपको परमसुख और परम आनंद की प्राप्ति करनी है तो भीतर जाकर स्वयं की आत्मा में रमण करना होगा। संसार में रहकर क्षणिक सुख को ही परम आनंद और सुख समझ लेना। यह एक भ्रांति है। हमें इस भ्रांति को तोडऩा होगा, जब तक यह भ्रांति नहीं टूटेगी। तब तक आप भीतर के अपने तत्व को समझ नहीं पाओगे। समकित और मिथ्यात्व का अर्थ बताते हुए कहा कि समकित वह है जो आपके भीतर है। स्वयं के भीतर जाकर आत्म तत्व को जानना ही समेकित कहलाता है। इससे पूर्व शुभम मुनि ने उत्तराध्ययन सूत्र का वाचन करते हुए मोक्ष मार्ग और संयम पथ की प्रेरणा दी। चातुर्मास संयोजक वीरेंद्र डांगी ने कहा कि गुरुवार को भी आचार्यश्री के दर्शनार्थ बाहर से कई श्रावक श्राविकाएं महाप्रज्ञ विहार पहुंचे।

सेहत संपत्ति, संतोष खजाना
हुमड़ भवन में विशेष विधान के बीच मुनि सुमित्र सागर ने कहा कि भगवान के चरणों में पति, पत्नी, बेटा, बेटी या धन दौलत कभी मत मांगना। बल्कि मांगना तो बस इतना की भगवान अंतिम सांस तक आपका नाम लेता रहूं। सबके काम आता रहूं। संसार में सेहत सबसे बड़ी सम्पत्ति है और सन्तोष सबसे बड़ा खजाना है। रास्ते में कंकड़ ही कंकड़ हो तो जूता पहन कर चलना अच्छा है। एक अच्छे जूते के अन्दर एक भी कंकड़ हो तो अच्छी सड़़क पर कुछ कदम तक चलना भी मुश्किल हो जाता है।

नाकोड़ा तीर्थ में 23 को चूरमा भोग
नाकोड़ा भैरव भक्ति मण्डल की गुरुवार को हुई बैठक में नाकोड़ा तीर्थ पर 23 नवम्बर को कार्तिक पूर्णिमा पर चूरमे का भोग लगाने पर सहमति बनी। अध्यक्ष मंडल सचिव ललित लोढ़ा ने बताया कि कार्यक्रम में उदयपुर ५ सौ लोगों को नाकोड़ा तीर्थ ले जाया जाएगा। वहां वरघोड़ा, ५६ भोग, रात्रिकालीन भक्ति संध्या एवं भोजन प्रसादी का आयोजन होगा।

आलस्य है बाधक
आयड़ वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संस्थान के तत्वावधान में ऋषभ भवन में चातुर्मास कर रहे मुनि प्रेमचंद ने धर्मसभा में कहा कि आलस्य व्यक्ति की सफलता के मार्ग में सबसे बड़ा बाधक है। आलसी व्यक्ति किसी भी कार्य को सही ढंग से नहीं करता। इससे उसे असफलता सामना करना पड़ता है। आलस्य का त्याग कर ही व्यक्ति को सफलता मिल सकती है।