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PATRIKA EXCLUSIVE: उदयपुर के तनख्वाह की खातिर गुरुजी फूंक रहे छात्र कोष, अधिकतर स्कूलों में छात्र विकास कोष से बनवा रहे वेतन बिल

मामले में प्रधानाचार्य बेबसी जाहिर कर रहे हैं कि वहां से पैसा नहीं खर्च करें तो क्या करें।

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PATRIKA EXCLUSIVE: student funds fraud in udaipur schools

भुवनेश पण्ड्या / उदयपुर . अपने बटुए को भरने के लिए गुरुजी अपने शिष्यों के हक का पैसा खर्च कर रहे हैं या यूं कहें बच्चों के विकास का पैसा गुरुजी के विकास में लग रहा है। जिले के माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूलों के शिक्षकों के वेतन बिल बनाने के लिए छात्र विकास कोष की राशि का बेधडक़ इस्तेमाल हो रहा है। मामले में प्रधानाचार्य बेबसी जाहिर कर रहे हैं कि वहां से पैसा नहीं खर्च करें तो क्या करें। बिल नहीं बनेंगे तो वेतन रुकेगा।


नियमानुसार छात्र कोष या विकास कोष की राशि का उपयोग छात्र हित में ही करना होता है। ग्रीन बोर्ड, रंग रोगन, फर्नीचर, शौचालय, बिजली व्यवस्था, प्रयोगशाला, कम्प्यूटर लैब और खेलकूद पर यह राशि खर्च होनी चाहिए। अन्य खर्च के लिए रमसा (राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान) मद में राशि मिलती है।


एक बानगी:
- राउमावि असलीगढ़ के प्रधानाचार्य मोहनलाल गौड़ का कहना है कि हम वेतन बिल बनाने के लिए मजबूरी में इस राशि का उपयोग कर रहे हैं। हमारे यहां आईसीटी लैब है, लेकिन नेट इतना स्लो है कि पे-मैनेजर पर काम नहीं हो पाता। इसके लिए कोई अलग से बजट नहीं है, इसलिए छात्र कोष से राशि लेनी पड़ती है।
- रामावि नयाखेड़ा के प्रधानाध्यापक दिनेश दशोरा का कहना है कि ये बिल स्वयं बनाना संभव नहीं है। स्कूल में इस स्तर का कम्प्यूटर का कोई काम नहीं जानता, तो क्या करें।
- राउमावि सीसारमा के प्रधानाचार्य लोकेश भारती का कहना है कि बिना बजट के ये कार्य छात्र कोष की राशि से ही हो रहा है। लिपिकों को चाहिए कि वे बिल बनाने के इस कार्य में स्वयं दक्ष होकर पूर्ण करें।

ये हैं बहाने

सरकार से हजारों रुपए की तनख्वाह लेने वाले शिक्षकों के वेतन बिल बनाने में छात्र कोष का इस्तेमाल इसलिए हो रहा है क्योंकि अधिकतर बाबू कम्प्यूटर पर कार्य करने में दक्ष नहीं हैं। ऐसे में वे पे-मैनेजर (वेतन के लिए बनी सरकारी साइट) पर ऑनलाइन बिल नहीं बना सकते हैं। इसलिए बिल बनाने का कार्य बाहर से करवाना पड़ता है, जबकि यह लिपिक का मूल कार्य है।


कई स्कूल ये तर्क देते हैं कि उनके यहां नेट की गति कम होने से पे-मैनेजर पर काम नहीं हो पाता है। ऐसे में इन बिलों को बाहर से बनवाना होता है।
कई स्कूलों के लिपिकों को पे-मैनेजर का प्रशिक्षण ही नहीं दिया गया है, ऐसे में उन्हें बिल बनाने नहीं आता।

...तो इस राशि का उपयोग क्यों ?
बच्चों के हक का पैसा खर्चने पर सवाल खड़े होते हैं। सरकार भी मानती है कि इसके लिए किसी बजट की जरूरत नहीं है तो स्पष्ट है कि यह काम लिपिक वर्ग को करना है या प्रधानाचार्य या प्रधानाध्यापक पूर्ण करवाए।

बिलकुल गलत
छात्र कोष से यदि वेतन बिल बनाने के लिए राशि ली जा रही है, तो यह नियम विपरीत व गलत है। इसे तुरंत रोकना होगा। इसके लिए रमसा से बजट जारी होता है।
नरेश डांगी, जिला शिक्षा अधिकारी माध्यमिक प्रथम