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Rajasthan: आहड़ और हड़प्पा संस्कृति का 4000 साल पुराना संबंध उजागर, मिट्टी के बर्तनों ने खोला इतिहास का राज

राजस्थान के नागौर क्षेत्र में आहड़ संस्कृति से जुड़ी 4000 वर्ष पुरानी नई साइट की खोज ने इतिहासकारों को महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं। इस खोज से सिंधु घाटी सभ्यता और आहड़ संस्कृति के बीच संभावित व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंधों की नई समझ सामने आई है।

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उदयपुर

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Akshita Deora

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गौरव शर्मा

May 14, 2026

Ahar and Harappan Cultures

नुकीले चर्ट पत्थर के अवशेष भी मिले हैं, जिनका उपयोग प्राचीन काल में औजार बनाने या आग जलाने के लिए किया जाता था (फोटो: पत्रिका)

Ancient Civilizations Confluence In Nagaur: राजस्थान में पुरातत्व विज्ञान के क्षेत्र में बड़ी सफलता मिली है। वैज्ञानिकों ने नागौर की सीमा क्षेत्र में 4000 वर्ष पुरानी आहड़ संस्कृति से जुड़ी नई साइट खोज निकाली है। वर्ष 2022 में पहली बार यहां अवशेष मिले थे। हाल ही में राजस्थान विद्यापीठ के पुरातत्व साहित्य संस्थान में इनके विश्लेषण और शोध अध्ययन में नई साइट के तथ्य सामने आए हैं। यह साइट न केवल आहड़ संस्कृति के विस्तार को दर्शाती है, बल्कि भारत की दो प्राचीन सभ्यताओं सिंधु घाटी (हड़प्पा) और आहड़ के बीच व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंधों की नई कड़ी भी खोल रही है।

पुरातत्वविदों को उम्मीद है कि इस इलाके में और भी स्थलियां मिल सकती हैं, जो यह साबित करेंगी कि प्राचीन काल में इन सभ्यताओं के बीच केवल भौगोलिक दूरी थी, लेकिन व्यापार और संस्कृति के माध्यम से ये एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी थीं। यह खोज भारतीय इतिहास के उस पन्ने को पुख्ता करती है, जहां ग्रामीण आहड़ संस्कृति और शहरी हड़प्पा संस्कृति के लोग आपस में संवाद और व्यापार करते थे।

दो सभ्यताओं का मिलन केंद्र बना नागौर

जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ उदयपुर के पुरातत्व विशेषज्ञ रामेंद्र देवड़ा के अनुसार, नागौर के पास करीब 500 गुणा 500 मीटर के क्षेत्र में आहड़ संस्कृति के साक्ष्य मिले हैं। यह स्थान आहड़ की अन्य ज्ञात स्थलियाें से करीब 150 किमी दूर है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह स्थान सिंधु घाटी सभ्यता (जो राजस्थान, गुजरात और पाकिस्तान में फैली थी) और आहड़ संस्कृति (मेवाड़ क्षेत्र) के बीच व्यापारिक केंद्र के रूप में मौजूद रहा होगा।

मिट्टी के बर्तनों ने खोले राज

इस नई साइट की पहचान आहड़ संस्कृति की विशिष्ट शैली वाले बर्तनों से हुई है। सर्वेक्षण में मिले अवशेषों की खासियत ही इसके तार आहड़ संस्कृति से जुड़े होने की बात साबित कर रहे हैं।

लाल-काले बर्तन: यहां से मिले मिट्टी के बर्तनों के अवशेष कटोरा और बड़ा घड़ा, जिस पर सफेद रंग की पेंटिंग है, जो आहड़ संस्कृति की सिग्नेचर शैली है।

चर्ट पत्थर के औजार: नुकीले चर्ट पत्थर के अवशेष भी मिले हैं, जिनका उपयोग प्राचीन काल में औजार बनाने या आग जलाने के लिए किया जाता था। ये अवशेष भीलवाड़ा, उदयपुर और राजसमंद में मिली आहड़ साइट्स के बिल्कुल समान हैं।

ग्रामीण से शहरीकरण की ओर बढ़ता समाज

विशेषज्ञों का कहना है कि जहां हड़प्पा अपनी शहरी व्यवस्था के लिए प्रसिद्ध थी, वहीं आहड़ एक समृद्ध ग्रामीण संस्कृति थी। नागौर में मिले साक्ष्य बताते हैं कि यह ग्रामीण संस्कृति धीरे-धीरे शहरीकरण की ओर कदम बढ़ा रही थी। आहड़ संस्कृति में 18 से 20 प्रकार के अनाजों की खेती के सबूत मिले हैं। यहां के लोग तकनीकी दक्ष थे और धातुओं के जेवरात व कपड़ों का उपयोग करते थे। इस संस्कृति की साइट्स में किलेनुमा दीवारें भी मिली हैं, जो एक संगठित समाज या केंद्रीकृत शासन की ओर इशारा करती हैं।

त्रिकोणीय संबंध की संभावना

वैज्ञानिकों के अनुसार, यह नई खोज राजस्थान की तीन प्रमुख संस्कृतियों के बीच संबंधों को समझने में मदद करेगी। नागौर में मिली आहड़ संस्कृति की साइट से सिंधु घाटी सभ्यता का सबसे नजदीकी स्थल 240 किमी है।

  1. आहड़ संस्कृति: दक्षिण-पूर्वी राजस्थान (अजमेर, उदयपुर, राजसमंद)।
  2. सिंधु घाटी सभ्यता: पश्चिमी राजस्थान और गुजरात।
  3. गणेश्वर-जोधपुरा संस्कृति: उत्तर-पूर्वी राजस्थान (जयपुर, झुंझुनूं, सीकर)।