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सत्यार्थ प्रकाश के प्रचार-प्रसार से ऋषि ऋण से उऋण हो सकते हैं : स्वामी सुमेधानन्द सरस्वती

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Satyartha Prakash

सत्यार्थ प्रकाश के प्रचार-प्रसार से ऋषि ऋण से उऋण हो सकते हैं : स्वामी सुमेधानन्द सरस्वती

प्रमोद सोनी/उदयपुर. साध्य प्राप्ति के लिए साधक एवं साधन की आवश्यकता होती है। वर्तमान में आर्य समाज के पास साधन और साधक दोनों का अभाव है। उत्कृष्ट विद्वानों के दिवंगत होने पर उनकी क्षतिपूर्ति कर नवीन विद्वानों का उदय न होना तथा विभिन्न संगठन एवं संस्थाओं में विभक्त होने से साधनों का बंट जाना आर्य समाज के एवं महर्षि दयानन्द के सिद्धान्तों के प्रचार-प्रसार में एक बड़ी बाधा है। यह बात स्वामी सुमेधानन्द सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश महोत्सव के दूसरे दिन अध्यक्षीय उद्बोधन में कही। उन्होंने आर्यजनों का आह्वान किया कि पारस्परिक विखण्डन को दूर कर संगठित होकर सत्यार्थ प्रकाश का प्रचार-प्रसार करने से ही ऋषि ऋण से उऋण हो सकते हैं। वद्र्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. डॉ. परमेन्द्र कुमार दशोरा ने सत्यार्थ प्रकाश को माता-पिता व आचार्य की अनुपस्थिति में एकमात्र गुरु बताया। उन्होंने कहा कि यह ग्रन्थ एक वास्तविक श्रेष्ठ निर्माण में परम सहायक है। मुम्बई के डॉ. सोमदेव शास्त्री ने सत्यार्थ प्रकाश को क्रान्तिकारी ग्रन्थ बताया। उन्होंने कहा कि सैंकड़ों क्रान्तिकारियों ने सत्यार्थ प्रकाश से ही स्वदेश प्रेम, स्वधर्म तथा स्वराज्य की शिक्षा प्राप्त की। सम्मेलन के आरम्भ में सीताबाड़ी के वेदप्रिय शास्त्री ने मानव निर्माण में सत्यार्थ प्रकाश की भूमिका विषय पर बोलते हुए कहा कि प्रशस्त, धार्मिक एवं विद्वान माता-पिता एवं आचार्य मिलकर बालक का निर्माण करते हैं। इन तीनों में से एक भी आयोग्य हो तो श्रेष्ठ मानव का निर्माण संभव नहीं है। सत्यार्थ प्रकाश में श्रेष्ठ माता-पिता बनने के लिए विस्तृत सारगर्भित वर्णन किया गया है। सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान सुरेश चन्द्र आर्य ने वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए त्रिसूत्री कार्ययोजना बनाने पर बल दिया। नगर निगम के उपमहापौर लोकेश द्विवेदी ने न्यास के कार्यक्रमों की भूरि-भूरि प्रशंसा एवं सराहना की। महोत्सव का शुभारम्भ प्रात:कालीन यज्ञ के साथ हुआ। यज्ञ के ब्रह्मा डॉ. ज्वलन्त कुमार शास्त्री थे। जिन्होंने यज्ञ के आध्यात्मिक स्वरूप पर विस्तृत प्रकाश डाला। इन्द्रदेव पीयूष के ईश भक्ति पर भजन हुए। इस सत्र का संयोजन इन्द्रप्रकाश यादव ने किया। कार्यक्रम का संयोजन ओमप्रकाश वर्मा ने किया एवं धन्यवाद न्यास के सहमंत्री डॉ. अमृतलाल तापडिय़ा ने ज्ञापित किया।