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‘शैतान’ ने खूब हंसाया, मेवाड़ी कॉमेडी से बनाई अलग पहचान

शैतानसिंह चौहान की कहानी केवल एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बनने की नहीं, बल्कि संघर्ष, धैर्य और जिद की मिसाल है। उनका बचपन ननिहाल में बीता, जहां उन्होंने आठवीं तक पढ़ाई की। आर्थिक स्थिति सामान्य थी। पढ़ाई के दौरान सरकारी योजनाओं के तहत दो बार लैपटॉप मिले, तो तकनीक के प्रति रुझान बढ़ाया। हालांकि, बारहवीं के बाद हालात बदले और परिवार आर्थिक संकट में आ गया। पिता का छोटा व्यवसाय कोरोना के दौरान ठप हो गया, वहीं मां को घर चलाने के लिए अपना मंगलसूत्र तक गिरवी रखना पड़ा।

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राजसमंद जिले में नाथद्वारा क्षेत्र के छोटे से गांव खुमानपुरा के युवा शैतानसिंह चौहान ने संघर्षों से भरे जीवन को अपनी ताकत बनाकर सोशल मीडिया पर अलग पहचान बनाई है।

SOURSE PATRIKA PHOTO

आर्थिक तंगी और पारिवारिक चुनौतियों के बीच 4 लाख फॉलोअर्स तक पहुंचा ‘राजसमंदवासी’, अब भाषा और संस्कृति को दे रहा नया मंच

उदयपुर. राजसमंद जिले में नाथद्वारा क्षेत्र के छोटे से गांव खुमानपुरा के युवा शैतानसिंह चौहान ने संघर्षों से भरे जीवन को अपनी ताकत बनाकर सोशल मीडिया पर अलग पहचान बनाई है। मेवाड़ी भाषा में कॉमेडी वीडियो बनाकर वह लाखों लोगों को हंसा रहा है और अपनी संस्कृति को भी आगे बढ़ा रहे है।

शैतानसिंह चौहान की कहानी केवल एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बनने की नहीं, बल्कि संघर्ष, धैर्य और जिद की मिसाल है। उनका बचपन ननिहाल में बीता, जहां उन्होंने आठवीं तक पढ़ाई की। आर्थिक स्थिति सामान्य थी। पढ़ाई के दौरान सरकारी योजनाओं के तहत दो बार लैपटॉप मिले, तो तकनीक के प्रति रुझान बढ़ाया। हालांकि, बारहवीं के बाद हालात बदले और परिवार आर्थिक संकट में आ गया। पिता का छोटा व्यवसाय कोरोना के दौरान ठप हो गया, वहीं मां को घर चलाने के लिए अपना मंगलसूत्र तक गिरवी रखना पड़ा। यह दौर शैतानसिंह के जीवन का सबसे कठिन समय रहा। बीएससी के बाद उन्हें पढ़ाई छोड़कर नौकरी करनी पड़ी और चार साल तक काम किया। कोरोना के दौरान जब आर्थिक हालात और बिगड़े, तब नौकरी के साथ-साथ कुछ नया करने का विचार आया। एक दिन सोशल मीडिया पर कार्टून वीडियो देखकर उन्हें मेवाड़ी भाषा में कॉमेडी कंटेंट बनाने का आइडिया मिला। यहीं से ‘राजसमंदवासी’ पेज की शुरुआत हुई।

शुरुआत आसान नहीं थी। 12 घंटे की नौकरी के बाद देर रात तक स्क्रिप्ट लिखना और सुबह 4 बजे वीडियो शूट करना उनकी दिनचर्या बन गई। करीब 100 वीडियो अपलोड करने के बावजूद कोई खास रिस्पॉन्स नहीं मिला, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। आखिरकार एक वीडियो ‘नोचू की राजसमंद वाली’ वायरल हुआ और यही उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट बन गया। उनके वीडियो में गांव की संस्कृति, पारिवारिक रिश्ते और मेवाड़ी भाषा की मिठास झलकती है, जिससे लोग आसानी से जुड़ते हैं।

यों चलता गया सफर

इस सफर में उनके माता-पिता और भाई विनोद सिंह चौहान का अहम योगदान रहा। जहां रिश्तेदारों और परिचितों से शुरुआती दौर में समर्थन नहीं मिला, वहीं परिवार ने हर कदम पर उनका हौसला बढ़ाया।- शैतानसिंह का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मेवाड़ी भाषा को पुनर्जीवित करना है। वे कहते हैं कि आज के युवा अपनी क्षेत्रीय भाषा से दूर होते जा रहे हैं, ऐसे में कॉमेडी के माध्यम से उसे लोकप्रिय बनाना जरूरी है।- आज इंस्टाग्राम पर 4 लाख, फेसबुक पर 75 हजार और यूट्यूब पर 25 हजार फॉलोअर्स हैं। अब ‘कलेवा’ नाम से एक स्टार्टअप भी शुरू किया है, जिसमें पारंपरिक बाजरे से बने हेल्दी प्रोडक्ट्स बाजार में लाने की तैयारी है।

स्थानीय भाषा

परंपराओं को नया जीवनसोशल मीडिया पर क्षेत्रीय भाषाओं का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है। छोटे शहरों और गांवों से निकलकर युवा अपनी बोली और संस्कृति को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ला रहे हैं। इससे न केवल उनकी पहचान बन रही है, बल्कि स्थानीय भाषा और परंपराओं को भी नया जीवन मिल रहा है।

ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार के अवसर

बाजरे जैसे पारंपरिक अनाज आज फिर से लोकप्रिय हो रहे हैं। हेल्थ कॉन्शियस लोगों के बीच इनकी मांग बढ़ रही है। ऐसे में देसी खान-पान पर आधारित स्टार्टअप्स ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर खोल रहे हैं और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहे हैं।

युवाओं के लिए संदेश

सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर शैतान सिंह कहते हैं कि जब समय खराब होता है, तब असली साथ कौन देता है, यह समझ आता है। मेहनत करते रहो, शुरुआत में लोग मजाक उड़ाएंगे, लेकिन एक दिन वही लोग तारीफ करेंगे। अपनी भाषा और पहचान पर गर्व करो।