35 माह 5 दिन तक रथ में ही विराजे प्रभु
शोध प्रबंध में बताया कि औरंगजेब ने 1670 में मथुरा में केशवराय मंदिर को तोडऩे का फरमान जारी किया था। इससे पहले गोविंदरायजी श्रीनाथजी को रथ में लेकर रवाना हो गए। श्रीनाथजी को आगरा, धनदौटी घाट चम्बल, किशनगढ़ के अजमती गांव, जोधपुर के चौपासनी, उदयपुर, घसियार स्थानों पर ले जाया गया। महाराणा राजसिंह ने तिलकायत को वचन दिया कि मेवाड़ का एक भी बालक जीवित रहने तक श्रीनाथजी को कोई आक्रमणकारी स्पर्श नहीं कर सकेगा। इसके बाद तिलकायत ने विक्रम संवत 1728 को श्रीनाथजी को नाथद्वारा (सिंहाड़) में विराजित किया। इससे पूर्व 2 साल 11 महीने 5 दिन तक श्रीनाथजी रथ में ही विराजित रहे।