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हमारे सौंफ की महक पहुंच रही है गुजरात तक

किसानों ने नवाचार कर बड़े पैमाने पर शुरू की खेती

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हमारे सौंफ  की महक पहुंच रही है गुजरात तक

हमारे सौंफ की महक पहुंच रही है गुजरात तक

झाड़ोल (उदयपुर). गुजरात सीमा के निकटवर्ती गांव डैया, अम्बासा, नालवा, लथुनी सहित कई गांवों में किसानो ने परंपरागत खेती को छोड़कर नवाचार करते हुए सौंफ की बुवाई की है। वर्तमान में इन खेतों में सौंफ की फसल लहलहा रही है।डैया क्षेत्र के हुंडली निवासी किसान होमा पिता नानालाल बताते हैं कि वैसे तो सौंफ की खेती खरीफ व रबी के मौसम में की जा सकती है लेकिन अधिक उत्पादन रबी के मौसम में प्राप्त होता है। इसी कारण क्षेत्र में रबी के मौसम में सौंफ की खेती की ओर रुझान बढ़ा है। कोरोना महामारी का प्रकोप व बढ़ती महंगाई के बीच इस प्रयास से जीवन स्तर तो उन्नत हुआ ही वहीं इस क्षेत्र मे किसानों के लिए सौंफ की खेती बेहतर आमदनी के लिए प्रेरणा स्रोत बनी हुई है। क्षेत्र के किसानों द्वारा पहले परम्परागत खेती मक्का, गेहूं, तुअर आदि की खेती अधिक की जाती थी लेकिन क्षेत्र में अधिकतर किसानों ने परंपरागत खेती को छोड़कर नवाचार करते हुए सौंफ की खेती शुरू की।
मुनाफे की फसल है सौंफ की खेती
किसान होमा पिता नानालाल ने बताया कि खेत में दीपावली से पहले सौंफ की बुवाई एक बीघा में की जिसमे करीब 7-10 हजार रुपए का खर्चा आता है, फसल पकने पर कमाई करीब 20-25 हजार रुपए तक होगी मुनाफा अन्य परंपरागत फसलों से अधिक है। फसल होली तक पूर्ण रूप से पक जाएगी। उन्होंने बताया कि इसमें मेहनत अधिक करनी पड़ती है समय-समय पर देखभाल की जरूरत रहती है।
गुजरात के उंझा मे बिकती है सौंफ
डैया क्षेत्र में पहले तीन से पांच किसान ही सौंफ की खेती करते थे लेकिन अन्य फसलों से अधिक मुनाफा मिलने के कारण वर्तमान में क्षेत्र मे करीब 20-25 किसानों द्वारा सौंफ की खेती की जा रही है। क्षेत्र के अधिकतर किसान गुजरात नजदीक होने के कारण सौंफ को गुजरात के ऊंझा में बेचते है जहां इसका उपयुक्त दाम मिलता है।
सौंफ स्वास्थ्य के लिए है फायदेमंद
वैसे तो सौंफ का उपयोग कई रूपों में किया जाता है। सौंफ का सबसे अधिक उपयोग मसालों के लिए किया जाता है साथ ही यह यह पाचन संबंधी समस्याओं से लेकर आंखों की रोशनी बढ़ाने, मुंह की दुर्गंध दूर करने और अन्य समस्याओं से छुटकारा दिलाने में मददगार साबित होती है।