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चट्टानों के बीच आस्था का चमत्कार, यही है मेवाड़ का अमरनाथ

उदयपुर

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Newsdesk

Aug 05, 2026

Rajasthan

Bप्राकृतिक गुफा में आज भी सप्त नदियां, कामधेनु के स्तन और गौमुख से अविरल जलधारा कर रही बाबा का अभिषेकB
Bकुंभलगढ़. Bहरितिमा से आच्छादित अरावली की घनी और दुर्गम पहाड़ियों के बीच विशालकाय चट्टानों में स्थित बाबा परशुराम महादेव की प्राकृतिक गुफा आज भी आस्था, प्रकृति और रहस्य का अद्भुत संगम बनी हुई है। यहां सप्त नदियों, कामधेनु गाय के स्तन और गौमुख से निरंतर गिरती जलधारा स्वयंभू शिवलिंग का अभिषेक करती है। इसी अलौकिक प्राकृतिक स्वरूप के कारण सपरिवार विराजित स्वयंभू शिवलिंग के इस धाम को ‘मेवाड़ का अमरनाथ’ कहा जाता है। मान्यता के अनुसार त्रेता युग में भगवान श्रीराम से पूर्व ब्रह्मवंश के भृगुकुल में महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के यहां काशी-वाराणसी, उत्तरप्रदेश में वैशाख शुक्ल अक्षय तृतीया के दिन मध्याह्न काल में भगवान परशुराम का अवतार हुआ था।

मंदिराकार गुफा और रहस्यमयी चट्टानें

प्राकृतिक गुफा मंदिराकार स्वरूप में दो भागों में बनी हुई है। स्वयंभू शिवलिंग के ऊपर कमलाकार विशाल झूलता हुआ गौमुख बना हुआ है, जिससे बूंद-बूंद जल निरंतर शिवलिंग का अभिषेक करता रहता है। यह अद्भुत दृश्य श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर देता है। समुद्र तल से लगभग 3955 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस तीर्थ की कुल लंबाई 3.8 किलोमीटर है। यह स्थल कुंडधाम से 1.5 किलोमीटर तथा फूटा मंदिर से 1.2 किलोमीटर की दूरी पर अरावली की पहाड़ियों में स्थित है।
Bस्वयंभू शिवलिंग में शिव परिवार के दर्शनB
प्राकृतिक गुफा में प्रकृति निर्मित स्वयंभू शिवलिंग स्थित है। इसमें दाईं ओर गणपति, बाईं ओर कार्तिकेय तथा मध्य भाग में शिव-पार्वती सहित संपूर्ण शिव पंचायत का स्वरूप स्पष्ट दिखाई देता है। शिवलिंग में नौ खड्डेनुमा भंडार बने हुए हैं, जिनमें हर समय पानी भरा रहता है। समीप ही नंदी का पिंड तथा बाईं ओर राक्षस के सिर और धड़ के आकार का पाषाण पिंड भी बना हुआ है। बाबा परशुराम के देशभर में अनेक तपस्थल बताए जाते हैं, जिनमें काशी, बद्रिकाश्रम, जनकपुर, पुष्कर, मातृकुंडिया, आबू पर्वत, शेली, परशुराम महादेव मेवाड़, अरावली शिखर, बनास नदी, ऋषिकेश, उज्जैन, विंध्यांचल पर्वत, नर्मदा, ओंकारेश्वर, पश्चिमी समुद्र तट, हिंगुल पहाड़ी, हिमाद्रि वन, कावेरी नदी तथा असम में ब्रह्मपुत्र के किनारे महेंद्राचल पर्वत शामिल हैं।

Bशिवरात्रि पर मिले दर्शन, फिर खुला गुफा का रहस्यB

लगभग पांच सौ वर्ष पूर्व मेवाड़ के कुंभलगढ़ क्षेत्र पर दशनाम गोस्वामी महात्माओं का अधिकार था। उस समय तपोमूर्ति महंत केशवपुरी बाबा परशुराम के परम भक्त थे। मान्यता है कि शिवरात्रि पर भगवान ने महंत केशवपुरी को दर्शन देकर इस स्थल की जानकारी दी। गुफा तक पहुंचना असंभव था। इसके बावजूद महंत ने आदिवासियों के सहयोग से रस्से लटकाकर गुफा में प्रवेश किया। वहां मंदिराकार विचित्र गुफा, स्वयंभू शिवलिंग और गौमुख से दूध की अविरल धारा से हो रहा अभिषेक देखकर वे भाव-विभोर और मंत्रमुग्ध हो गए। महंत के शिष्य केसरपुरी ने आदिवासियों की सहायता से दुर्गम पहाड़ियों में गुफा तक पहुंचने के लिए पगडंडी बनवाई और चढ़ाई के लिए लकड़ी की सीढ़ी तैयार करवाई। बाद में उनके पुत्र भीमपुरी ने पूजा-अर्चना का दायित्व संभाला और मार्ग को यथासंभव सुगम बनाया।
राजा-महाराजाओं के सहयोग से हुआ विकास
महंत भोमपुरी ने राजा-महाराजाओं के सहयोग से उदावड़ से गुफा मंदिर और गुफा मंदिर से मारवाड़ तक मार्गों का निर्माण करवाया। यात्रियों की समस्याओं के समाधान के लिए पानी का टांका, पक्की सीढ़ियां तथा ठहरने की व्यवस्था भी करवाई गई। स्वर्गीय महंत भोमपुरी के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र महंत नवलपुरी ने पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी संभाली और अपने प्रयासों से आवश्यक विकास कार्य करवाए। उनके देवलोकगमन के बाद छोटे भाई महंत शिवपुरी ने बाबा की सेवा-पूजा शुरू की। महंत शिवपुरी के स्वर्गवास के बाद महंत स्वर्गीय ओंकारपुरी के परिवार के महंत वासुदेवपुरी तथा स्वर्गीय शिवपुरी के परिवारजन आज भी बाबा की सेवा-पूजा और अर्चना कर रहे हैं।

1999 के बाद विकास ने पकड़ी रफ्तार

वर्तमान ट्रस्ट का गठन वर्ष 1987 में हुआ और वर्ष 1995 में इसका पंजीकरण हुआ। प्रारंभिक वर्षों में विकास की गति धीमी रही और कोई विशेष निर्माण कार्य नहीं हो सके। अगस्त 1999 में पूर्व विधायक गणेशसिंह परमार ने ट्रस्ट अध्यक्ष का दायित्व संभाला, जिसके बाद विकास कार्यों ने गति पकड़ी। इस प्राकृतिक शिवधाम पर श्रावण शुक्ल षष्ठी को राज्यस्तरीय भजन संध्या होती है। वर्ष 2004 से पूर्व यह आयोजन मुख्य गुफा मंदिर से कुंडधाम के मार्ग पर अमरगंगा में होता था, लेकिन वर्ष 2004 से ट्रस्ट अध्यक्ष गणेशसिंह परमार के प्रयासों से फूटा मंदिर पर विशाल भजन संध्या आयोजित की जाने लगी।