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उदयपुर : मावली हत्याकांड: आरोपी की मृत्युदंड की सजा निरस्त, उम्रकैद बरकरार

मावली हत्याकांड में हाईकोर्ट ने आरोपी को दुष्कर्म व पॉक्सो आरोपों से बरी करते हुए मृत्युदंड निरस्त किया, लेकिन हत्या के मामले में उम्रकैद बरकरार रखी।
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उदयपुर. मावली क्षेत्र में 2023 में आठ वर्षीय बालिका की हत्या और बलात्कार के बहुचर्चित मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को अपास्त करते हुए मुख्य आरोपी कमलेश सिंह को दुष्कर्म एवं पॉक्सो की गंभीर धाराओं से दोषमुक्त कर दिया। विशिष्ट न्यायालय पॉक्सो एक्ट क्रम-2 की सुनाई मृत्युदंड की सजा निरस्त कर दी, जबकि हत्या के अपराध में आरोपी को आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी। आरोपी के माता-पिता किशन कंवर और रामसिंह को भी साक्ष्य मिटाने एवं सूचना छिपाने के आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।

राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने आरोपी की ओर से पेश अपील एवं विशिष्ट न्यायालय ( पॉक्सो एक्ट-2) की ओर से मृत्युदंड की पुष्टि के लिए पेश की गई रेफरेन्स याचिका की सुनवाई करते हुए यह निर्णय दिया। पूर्व में हाइकोर्ट ने अभियुक्त के मृत्युदंड पर अंतिम निस्तारण तक रोक लगा दी थी।

दुष्कर्म के आरोप के समर्थन में नहीं मिले वैज्ञानिक साक्ष्य

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि मृतका के साथ बलात्कार हुआ। न्यायालय ने पाया कि इस संबंध में कोई ठोस वैज्ञानिक, चिकित्सकीय या मौखिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में भी महिला चिकित्सक ने बलात्कार के संबंध में कोई स्पष्ट राय नहीं दी। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि मृतका के शरीर से लिए नमूनों और आरोपी के कपड़ों से मिले वीर्य के नमूनों का डीएनए मिलान नहीं हुआ। इन परिस्थितियों में अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 376-एबी तथा पोक्सो अधिनियम की धारा 5 (एम) एवं 6 के तहत दोषसिद्धि को अपास्त करते हुए इन आरोपों से आरोपी को बरी कर दिया। हालांकि उपलब्ध परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने हत्या के अपराध को सिद्ध माना और धारा 302 के तहत सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा यथावत रखी।

जांच में कई गंभीर कमियों का उल्लेख

हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत निर्णय में जांच प्रक्रिया की कई खामियों की ओर भी ध्यान दिलाया।

- प्रारंभिक जांच अधिकारी अजय सिंह ने जिरह में स्वीकार किया कि किसी भी आरोपी की निशानदेही पर शव या कोई आपत्तिजनक वस्तु बरामद नहीं हुई। शव की पैकिंग, सीलिंग और सुरक्षित अभिरक्षा से जुड़े आवश्यक दस्तावेज भी मौके पर तैयार नहीं किए।

- अदालत ने यह भी नोट किया कि घटनास्थल से फिंगरप्रिंट या फुटप्रिंट नहीं लिए गए, न ही कथित हथियारों पर उंगलियों के निशान तलाशने का प्रयास किया।

- डॉग स्क्वायड किसी भी आरोपी तक नहीं पहुंचा और उसकी पहले दिन जांच की अलग रिपोर्ट भी तैयार नहीं की गई। जब्त वस्तुओं की अभिरक्षा (चेन ऑफ कस्टडी) और तलाशी की प्रक्रिया में भी कई प्रक्रियागत कमियां सामने आई।

- जांच पूरी करने वाली अधिकारी कैलाश कुंवर ने भी स्वीकार किया कि आरोपी के खिलाफ कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था, माता-पिता की निशानदेही पर कोई बरामदगी नहीं हुई और उनके विरुद्ध कोई वैज्ञानिक या चिकित्सकीय साक्ष्य भी उपलब्ध नहीं था। हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ जांच में कमी होने से अभियोजन का मामला स्वतः समाप्त नहीं हो जाता, पर जब पूरा मामला परिस्थितिजन्य एवं वैज्ञानिक साक्ष्यों पर आधारित हो, तब जांच का निष्पक्ष, पारदर्शी और प्रक्रियानुसार होना अत्यंत आवश्यक है।

यह था मामला

मावली क्षेत्र में मार्च 2023 में आठ वर्षीय बालिका स्कूल से घर लौटने के बाद लापता हो गई थी। बाद में उसके शव के टुकड़े आरोपी के घर पास एक खंडहर में बोरे में मिले थे। पुलिस के अनुसार आरोपी कमलेश सिंह ने बच्ची को चॉकलेट का लालच देकर बुलाया, उसकी हत्या की और शव के टुकड़े कर ठिकाने लगा दिए। मामले में आरोपी के माता-पिता पर साक्ष्य मिटाने का भी आरोप लगाया था। विशिष्ट पॉक्सो न्यायालय ने 4 नवंबर 2024 को कमलेश सिंह को दुष्कर्म, पॉक्सो और हत्या सहित विभिन्न धाराओं में दोषी मानते हुए मृत्युदंड सुनाया था। वहीं उसके माता-पिता को भी साक्ष्य मिटाने के आरोप में चार-चार वर्ष के कारावास की सजा दी गई थी।

आरोपियों को मिली निशुल्क विधिक सहायता

चीफ लीगल एड डिफेंस काउंसिल गोविंद वैष्णव ने बताया कि आरोपी कमलेश सिंह तथा उसके माता-पिता की ओर से जिला विधिक सेवा प्राधिकरण उदयपुर के माध्यम से हाईकोर्ट में अपील दायर की गई। इससे पहले निचली अदालत में भी उन्हें निशुल्क विधिक सहायता उपलब्ध कराई गई।