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Rajasthan : अब भूसे से चलेगी मोबाइल और EV की बैटरी, लागत भी आएगी बहुत कम, उदयपुर के वैज्ञानिकों ने किया नया शोध

Rajasthan : अब भूसे से भी मोबाइल और इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी चार्ज होंगी। महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विवि (एमपीयूएटी) के रिन्यूएबल एनर्जी डिपार्टमेंट में हुए शोध ने यह कर दिखाया है।
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उदयपुर

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Sanjay Kumar Srivastava

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Updated: 31 Jul 2026, 5:53 PM IST

Rajasthan Udaipur MPUAT scientists Amazing work Now mobile and EV batteries run straw

Udaipur : शोध के बाद की फोटो पत्रिका

Rajasthan : जी हां… आपने सही पढ़ा है। अब भूसे से भी मोबाइल और इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी चार्ज होंगी। महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विवि (एमपीयूएटी) उदयपुर के रिन्यूएबल एनर्जी डिपार्टमेंट में हुए शोध ने यह कर दिखाया है। वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जिससे एग्रीकल्चर वेस्ट यानी भूसे का उपयोग करके लिथियम आयन बैटरी का एनोड तैयार किया गया है। देश में अपनी तरह का यह पहला प्रयोग है, जिसमें महंगे और आयात पर निर्भर रहने वाले ग्रेफाइट को पूरी तरह से 'ऑर्गेनिक कार्बन' से रिप्लेस किया गया है। यानी अब बैटरी खेती से निकले कचरे से चलेगी और खराब होने के बाद भी इसकी एनोड छड़ पूरी तरह से बायोडिग्रेडेबल होगी। कुलगुरु प्रताप सिंह ने बताया कि विवि को शोध के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आइसीएआर) के 'कंसोर्टियम रिसर्च प्लेटफॉर्म के जरिए 3 साल पहले 20 लाख रुपए की ग्रांट मिली थी।

दक्षता अच्छी, लागत में कमी

स्वदेशी तकनीक से तैयार बैटरी ने बाजार में व्यावसायिक रूप से इस्तेमाल हो रही ग्रेफाइट छड़ वाली बैटरी के बराबर ही नतीजे दिए। इस बैटरी की 'चार्ज और डिस्चार्ज कैपेसिटी' 88 फीसदी पाई गई है, जो बाजार में उपलब्ध सामान्य लिथियम बैटरी के बिल्कुल बराबर है। मात्र एक ग्राम ऑर्गेनिक कार्बन 383 मिली-एम्पियर (एमएएच) करंट को 1 घंटे तक देने में सक्षम है। 383 एमएएच क्षमता वाली बैटरी को 100 बार पूरी तरह चार्ज और डिस्चार्ज करने के बाद भी इसकी क्षमता लगातार बनी रहती है यानी 100 बार इस्तेमाल के बाद भी कार्बन कमजोर नहीं पड़ता।

बचत होगी, प्रदूषण रुकेगा

मेटल वाले पारंपारिक एनोड की लागत प्रति शेल लगभग 7367 आती है, जबकि इस ऑर्गेनिक कार्बन तकनीक से बनी एनोड की लागत मात्र 253 प्रति शेल बैठती है। ओवरऑल लिथियम आयन बैटरी की लागत में 20 से 30 फीसदी तक की कमी आएगी।

इलेक्ट्रिक वाहनों, मोबाइल और एनर्जी स्टोरेज सिस्टम में आने वाली लिथियम आयन बैटरियों में इस एनोड का उपयोग करके लागत काफी घटाई जा सकती है। साथ ही, वेटरी खराब होने के बाद ग्रेफाइट की छड़ों से होने वाले ई-कचरा प्रदूषण को भी रोका जा सकेगा।

यों समझें पूरी प्रक्रिया

विभागाध्यक्ष डॉ. नारायण लाल पंवार और शोधार्थी डॉ. सचिन हल्लद ने बताया कि फसल के अवशेषों को स्वदेशी तकनीक से 'बायोचार' में बदला। बायोचार को 400 डिग्री सेल्सियस तापमान पर गर्म कर इसे ठंडा करके खास कैमिकल के साथ ट्रीट किया जाता है। इससे यह चार्ज को बेहतर ढंग से स्टोर करने में सक्षम हो जाता है।

फिर इसे नैनो पार्टिकल पाउडर में बदलकर बैटरी में ग्रेफाइट की जगह इस्तेमाल होने वाली ऑर्गेनिक छड़ का निर्माण किया जाता है। लिथियम मेटल और ग्रेफाइट जैसी चीजें विदेशों से आयात करनी पड़ती हैं। इस स्वदेशी तकनीक से देश की निर्भरता अन्य देशों पर कम होगी।