60 साल के हेड कॉन्सटेबल ने पैदल 16 दिन में तय किया 500 किमी का सफर, सिर्फ दो दिन ही मिला खाना

उज्जैन के नीलगंगा थाने में पदस्थ हेड कांस्टेबल रमेश तोमर विसरा रिपोर्ट के सिलसिले में गए थे ग्वालियर। पुलिस के आला अधिकारियों ने की जवान की हिम्मत की तारीफ।

By: Faiz

Updated: 18 Apr 2020, 12:43 PM IST

उज्जैन/ देशभर में कोरोना वायरस का असर बहुत तेजी से फैल रहा है। ऐसे में सरकार की ओर से देशभर में लॉकडाउन लगाया गया है। लॉकडाउन के 21 दिन बीत जाने के बाद भी हालात न सुधरने पर प्रधानमंत्री मोदी द्वारा इस लॉकडाउन को 19 दिनों के लिए 3 मई तक एक बार फिर बढ़ाया गया है। लॉकडाउन ही एक तरकीब है, जिसके चलते बड़ी आबादी संक्रमण से बचे रहने में कामयाब हुई है। हालांकि, लॉकडाउन के दौरान ऐसी कई कहानियां भी हमारे सामने आईं, जिसमें लोगों को लॉकडाउन के चलते परेशानी का सामना करना पड़ा। कई लोग सैकड़ाें कि.मी पैदल चलते देखे गए। एक ऐसा ही एक वाक्या मध्य प्रदेश के उज्जैन में भी सामने आया। लेकिन, ये मामला बाकि सब मामलों से अलग इसलिए है क्योंकि, यहां पैदल चलने की कहानी किसी आम इंसान की नहीं बल्कि, एक पुलिसकर्मी की है।

 

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बिस्किट और नमकीन खाकर तय किया 14 दिन सफर

उज्जैन शहर के नीलगंगा थाने में पदस्थ हेड कांस्टेबल रमेश तोमर को भी लॉकडाउन के कारण पैदल सफर करना पड़ा। 60 वर्षीय तोमर 16 दिन तक पैदल चलने के बाद 500 कि.मी का सफर तय करके उज्जैन पहुंचे। हैरानी की बात ये भी है कि, इन 16 दिनों के सफर के बीच तोमर को सिर्फ दो दिन ही खाना नसीब हो सका। बाकी दिन उन्होंने बिस्किट और नमकीन खाकर ही अपनी पद यात्रा की। हेड कांस्टेबल तोमर के इस जज्बे की पुलिस के आला आलाधिकारियों ने भी सराहना की।

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न ट्रेन मिली न बस

आपको बता दें कि, हेड कांस्टेबल रमेश तोमर 21 मार्च को विसरा रिपोर्ट के सिलसिले में उज्जैन से ग्वालियर गए थे। यहां उन्होंने थाने पर रिपोर्ट जमा कर पावती ली। हालांकि, इस दौरान देशभर में लॉकडाउन लग चुका था। इधर हेड कांस्टेबल तोमर अपना काम निपटाकर जब तक उज्जैन आने के लिए स्टेशन पहुंचे, लॉकडाउन के चलते उन्हें स्टेशन पर घुसने नहीं दिया गया। उन्होंने तय किया कि, शायद बस की मदद से वो अपने कार्य स्थल उज्जैन पहुंच सकते हैं, पर जब वो बस स्टैंड पहुंचे, तो वहां कोई बस भी नहीं थी।

 

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इतने दिन बनाते रहे व्यवस्था, लेकिन नहीं निकला हल

अपने शहर पहुंचने की दोनो ही व्यवस्थाएं नाकाम होने के बाद उन्होंने शहर में ही चार कि.मी दूर अपनी बेटी के घर जाने का निर्णय लिया। वो पैदल चलकर अपनी बेटी के घर पहुंचे। शहर की प्रगति विहार कॉलोनी में रहने वाली बेटी ने पिता से कहा कि, पापा आप दो दिन यहीं रुक जाओ, थक भी गए हो और जाने की कोई व्यवस्था भी नहीं है। जैसे ही कुछ संसाधन की व्यवस्था हो जाए, आप लौट जाना। इस प्रकार दो से चार, चार से छह दिन बीत गए, लेकिन लॉकडाउन के कारण एक शहर से दूसरे शहर जाने के कोई आसार नजर नहीं आए। उन्होंने बेटे को फोन करके बुलाया, लेकिन वह नहीं आ पाया। फिर तोमर खुद ही पैदल चलकर बेटे के घर मुरैना पहुंच गए, यहां उन्होंने बेटे से कहा कि, उन्हें उज्जैन तक छोड़ दे, पर लॉकडाउन का हवाला देते हुए बेटे ने कहा कि, मैं आपको छोड़कर लौटूंगा तो पुलिस वाले रास्ते में मारेंगे। इसलिए मैं तो नहीं जा पाऊंगा। इसपर तोमर ने खुद ही उज्जैन पहुंचने का निर्णय लिया।

 

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सिर्फ दो दिन नसीब हुआ खाना

हेड कांस्टेबल तोमर ने बताया कि, मुरैना से उज्जैन तक का करीब 500 से 600 कि.मी का सफर उन्हें पैदल ही तय करना पड़ा। पब्लिक ट्रांसपोर्ट तो बंद था ही, वहीं सड़कों पर कहीं कहीं गाड़ियां दिखी भी तो, हालात के चलते किसी से लिफ्ट लेना भी ठीक नहीं समझा। वो 16 दिन पैदल चलते रहे। इस दौरान उन्हें सिर्फ दो दिन ही रोटी नसीब हुई। बाकी दिन बिस्किट और नमकीन के सहारे उन्होंने पैदल यात्रा की। उन्होंने बताया कि, घर से जो रोटी वे लेकर चले थे वो एक दिन चली। इसके बाद एक दिन उन्हें सरदार का ढाबा दिखा, जहां पर खाना मिल गया। 16 दिन बाद उज्जैन पहुंचे तोमर ने उच्च अधिकारियों को आपबीती सुनाई। इसपर सभी अधिकारियों को काफी हैरानी हुई। हालांकि, सभी ने उनके इस जज्बे की सराहना करते हुए उनकी हिम्मत की तारीफ की। वहीं, नीलगंगा क्षेत्र के सिंधी कॉलोनी चौराहे पर ड्यूटी दे रहे पुलिसकर्मियों ने तालियां बजाकर उनका स्वागत किया। ताेमर ने कहा कि यहां पर अधिकारियों ने मेरा उत्साह बढ़ाया। ये मेरे लिए गर्व की बात है।

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