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video : अधिकमास की अमावस्या : पितरों को प्रसन्न करना है, तो आज है खास दिन

सर्वार्थ सिद्धि योग में आ रही अधिकमास की अमावस्या, वर्षों बाद बनते हैं ऐसे संयोग

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उज्जैन. राजाधिराज भगवान महाकाल की नगरी में बहने वाली उत्तर वाहिनी मां शिप्रा के जल में स्नान तथा दान-पुण्य करने से अधिकमास का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। यदि पितरों को प्रसन्न करना है, तो आज का दिन बड़ा विशेष है। इस दिन पितरों के निमित्त दान-पुण्य और तर्पण करें। वर्षों के बाद सर्वार्थ सिद्धि योग में अधिकमास की अमावस्या का संयोग बन रहा है।

बहुत कम बनते हैं ऐसे संयोग
ज्योतिषाचार्य पं. अमर डिब्बावाला ने बताया पंचांगीय गणना के अनुसार ज्येष्ठ कृष्णपक्ष की अमावस्या बुधवार के दिन रोहणी नक्षत्र के साथ आ रही है। बुधवार को रोहणी नक्षत्र का होना सर्वार्थ सिद्धि योग का निर्माण कर रहा है। अमावस्या तिथि वाले दिन इस प्रकार के योग बहुत कम बनते हैं। विशेष बात यह है कि पुरुषोत्तम मास के आखिरी दिन सर्वार्थ सिद्धि योग का बनना अपने आपमें विशेष संयोग रखता है, क्योंकि जिन लोगों ने पूरे माह कोई धार्मिक क्रिया नहीं की, वह इस दिन नव नारायण, चौरासी महादेव, सप्त सागर का यदि ध्यान भी कर लेंगे, नमन कर लेंगे या उनका नाम जप लेंगे, तो भी इस मास का पुण्य फल प्राप्त होगा। जाते-जाते अधिकमास पुण्य को बढ़ाने के लिए सर्वार्थ सिद्धि जैसे योग का निर्माण कर रहा है। रोहणी नक्षत्र चूंकि भगवान कृष्ण से संबंधित है, पुरुषोत्तम भगवान विष्णु के 24 नामों में से एक है। इस तरह की स्थिति और बुधवार के साथ रोहणी का प्रभाव विशेष योग के साथ पुण्य फल की वृद्धि करवाता है।

वृषभ राशि में रहेंगे सूर्य-चंद्र
पंचांगीय गणना में गतिचार को देखें तो वृषभ राशि में सूर्य चंद्र का निर्माण करता है। चूंकि वृषभ राशि में चंद्रमा को उच्च का माना जाता है और सूर्य के साथ रहकर इसकी उपस्थिति धर्म की दृष्टि से विशेष मानी गई है। क्योंकि प्रकट तथा साक्षी देव में सूर्य, सोम, यम, काल इन चारों का नाम आता है। अर्थात सूर्य और चंद्र पुरुषोत्तम मास की अमावस्या में युतिकृत रहेंगे। इस प्रकार के योग संयोग में यदि पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान या धार्मिक यात्राओं में नव नारायण, सप्त सागर या इनके निमित्त दान या संकल्पित दर्शन अथवा ध्यान करने से भी इसका पुण्य फल प्राप्त होता है।

स्कंध पुराण के अवंतिखंड में है उल्लेख
स्कंध पुराण की मान्यतानुसार अवंतिखंड में नव नारायण तथा सप्त सागर एवं चौरासी महादेव का उल्लेख मिलता है। साथ ही यहां पर की गई विभिन्न प्रकार की पूजाओं में उसकी अलग-अलग प्राप्तियां दर्शायी गई हैं। चूंकि उज्जैन जीरो रेखांश पर अवस्थित है, उत्तर वाहिनी मां शिप्रा है और इसमें भी विशेष यहां पर यदि श्रद्धा से धर्म कार्य किया जाए, जिसके अंतर्गत शिप्रा स्नान महत्वपूर्ण है, अवंतिका की मान्यता पितृों के मोक्ष के लिए विशेष मानी गई है। यदि हम धर्म यात्रा की बात करते हैं, तो अलग-अलग ऋतु काल तथा देव-देवीयों का पूजन करने का उल्लेख भी स्कंध पुराण में मिलता है। अधिकमास का प्रश्न उठता है तो नवनारायण की यात्रा, चौरासी महादेव की पूजन का महत्व है। यदि समयाभाव हो तो नेमित्त मात्र तीर्थ स्थान पर जाकर स्नान-दान करके लाभ लिया जा सकता है।

इन्हें करें दान
- पितरों के निमित्त ब्राह्मण को सीधा सामग्री, अन्न दान, घी, फल आदि का दान करें।
- देवाताओं के निमित्त फल, स्वर्ण, वस्त्र, पुष्प, पंचामृत आदि दान करें।