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यहां भी है अष्टमुखी भगवान पशुपतिनाथ का मंदिर, श्रमिकों की मेहनत से आकार ले सका यह स्थान

ashtamukhi pashupatinath - 75 वर्ष पूर्व चंदा एकत्रित कर मिल मजूदर जयपुर से लाए थे प्रतिमा

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अतुल पोरवाल

उज्जैन. शिव के पशुपतिनाथ स्वरूप की महिमा ही न्यारी है। पशुपतिनाथ का नाम आते ही स्मृति पटल पर नेपाल के काठमांडू, मप्र के मंदसौर, उप्र के बनारस, ललितपुर, भक्तपुर आदि नाम सामने आते हैं। आपको जानकर आश्चर्य हो सकता है कि मालवा में मंदसौर के अलावा पशुपतिनाथ मंदिर उज्जैन में भी है। चामुंडा माता मंदिर के सामने विनोद मिल और इंदौर टैक्सटाइल के बीच स्थित भगवान पशुपतिनाथ मंदिर पर रोज ही सैकड़ों श्रद्धालु पहुंचते हैं, सावन में यह आंकड़ा हजार के आसपास पहुंच जाता है। मंदिर के मुख्य पुजारी पुरुषोत्तम चौबे के मुताबिक मिल मजदूरों ने चंदा इकट्ठा कर 75 वर्ष पूर्व नींव रखी। इसके लिए जयपुर से भगवान पशुपतिनाथ की प्रतिमा लाए। चंदे की रकम से मंदिर भी बनवाया।

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काठमांडू के पशुपति सबसे पुराने

काठमांडू का पशुपतिनाथ मंदिर पुरातनकालीन है। मान्यता के अनुसार इस मंदिर का निर्माण सोमदेव राजवंश के राजा पशुप्रेक्ष ने तीसरी सदी ईसा पूर्व में कराया था, लेकिन उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज 13वीं शताब्दी के हैं। मंदिर की नकलों में भक्तपुर (1480), ललितपुर (1566) और बनारस (19वीं शताब्दी के प्रारंभ में) शामिल है। मंदसौर के पशुपतिनाथ की प्रतिमा शिवना नदी से निकली थी, जिस पर वर्षों एक धोबी कपड़े धोया करता था। इन सभी मंदिरों व भगवान पशुपति की प्रेरणा से उज्जैन के मिल मजदूरों ने भी यहां मंदिर बनाने का प्रण लिया और चंदा इकट्ठा कर प्रतिमा लाए।

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यह है सावन मास का महत्व

पं. पुरुषोत्तम चौबे का कहना है, सावन भगवान भोले का प्रिय माह है। उज्जैन महाकाल के नाम से पहचाना जाता है। इस माह में पशुपतिनाथ मंदिर पर सुबह-शाम शृंगार के साथ पूजन होता है। इस महीने प्रत्येक सोमवार को रुद्राभिषेक और हवन होता है। मान्यता है कि 10 मंगलवार तक जो भक्त पशुपति को 10 लाल फूल चढ़ाता है, उसकी मनोकामना पूर्ण हो जाती है।

भूत-पिशाच ही नहीं, पशु-पक्षी और मनुष्य भी जिनका गुणगान करते हैं, उनका नाम देवों के देव महादेव है। पशुओं के पालनहार होने का अर्थ ही पशुपति है। उनके देव होने से ही वह पशुपतिनाथ कहलाए। भगवान शंकर एक ऐसे देव हैं, जिन्हें देव और दावन दोनों ही पूजते हैं। उनकी भक्ति सभी के लिए सरल है।