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इस प्रिंट के कपड़े पहन आप लगेंगे दूसरों से जुदा

नेशनल हैंडलूम-डे आज: आकर्षक और अद्वितीय हस्तकला को बाजार की तलाश, प्रतिस्पर्धा में टिके रहना बना चुनौती, ब्रांड युग में फीका हो रहा भैरवगढ़ प्रिंट का रंग

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उज्जैन. पौराणिक शहर उज्जैन की चुनिंदा प्राचीन पहचान में से एक भैरवगढ़ प्रिंट बाजारी प्रतिस्पर्धा के चुनौती दौर में हैं। एक ओर तेजी से बढ़ता ब्रांड युग वहीं दूसरी ओर भैरवगढ़ प्रिंट की छपाई का परंपरागत तौर तरीका... इन दोनों अलग-अलग स्थितियों में व्यावसायिक रूप से भैरवगढ़ प्रिंट की रंगत फीकी पड़ रही है। इसके बावजूद यदि थोड़ी पहचान जिंदा है तो वह वर्षों पुरानी आकर्षक व अद्वितीय कला की खूबी और कुछ लोगों द्वारा समय के साथ बदलाव के प्रयास के कारण। इस प्रिंट की अद्वितीय खूबी, पहनने या उपयोग करने वाले को भी दूसरों से जुदा बनाती है।

शहर की भैरवगढ़ प्रिंट कला सौ वर्ष से भी अधिक प्राचीन है। अपनी खूबी के चलते हस्तकला के क्षेत्र में आज भी इसकी अपनी अलग पहचान है। लेकिन इसे जिंदा रखना कलाकार और इससे जुड़े व्यावसाइयों के लिए मुश्किल हो रहा है। एक ओर नई पीढ़ी का इस क्षेत्र में रुझान कम होने से कारीगरों की संख्या कम होती जा रही है वहीं ब्रांड युग में रोज के बदलते फैशन के कारण बाजार में टिके रहना मुश्किल हो रहा है। हालांकि हैंडलूम का चलन बढऩे से देशभर में भैरवगढ़ पिं्रट की मांग जरूर है। बावजूद श्रम की तुलना में अपेक्षित दाम नहीं मिलने और कारीगरों की कमी के कारण मांग की तुलना में प्रोडक्शन नहीं होने से इस प्राचीन कला का दायरा अब भी पूरी तरह फैल नहीं पाया है। बुधवार को मनाए जाने वाले नेशनल हैंडलूम- डे पर शहर की इस विशेष पहचान को लेकर एक रिपोर्ट-

बंद होने लगे कारखाने

कालियादेह महल के नजदीक भैरवगढ़ क्षेत्र में होने वाली इस छपाई को क्षेत्र विशेष के कारण भैरवगढ़ पिं्रट का नाम मिला। ४०-५० वर्ष पूर्व यहां की छपाई की विशेष एहमियत थी। क्षेत्र में अधिकतर छिपा परिवारों इस कार्य से जुड़े। तब प्राकृतिक रंगों का उपयोग होता और बाद में यही पिं्रट बाग पिं्रट के नाम से भी जानी गई। अधिकतर परिवारों के लिए यह पुश्तैनी व्यवसाय है, लेकिन नई पीढ़ी इससे दूर हो रही है। वर्तमान में भैरवगढ़ प्रिंट के ४१ कारखाने हैं, जिनमें से तीन लगभग बंद हो चुके हैं। वहीं कारीगरों की कमी, बढ़ते खर्च और अपडेशन की कमी के कारण कई कारखाने बंद होने की कगार पर हैं। हालांकि इनमें कुछ एेसे भी हैं, जिन्होंने बाजार के स्वभाव को पहचान, अपने व्यवसाय में जरूरी बदलाव लाकर कारोबार बढ़ाया भी है।

इन खूबियों से बनाई अलग पहचान

- कपड़े के दोनों ओर छपाई नजर आती है।

- इसका रंग नहीं उतरता।

- पूरी तरह हस्त निर्मित होने के कारण दो सामग्री हूबहू नहीं हो सकती।

- यहां की डिजाइन-पिं्रट अन्य प्रदेशों से भिन्न है।

बाजार के लिए तैयार होने की जरूरत

अपडेट- अधिकतर छिपा असाक्षर हैं। बाजार के बदलते ट्रेंड के अनुसार उन्होंने अपनी छपाई की डिजाइन में बदलाव नहीं किए। बाजार जो चाहता है, उसकी जरूरत पूरी करने के लिए स्वयं को अपडेट नहीं किया। बजार की मांग और बदलते फैशन से तालमेल मिलाने के लिए अपडेट होने की जरूरत है।

बाजार- हस्तकला को प्रमोट करने के लिए शासकीय व निजी स्तर पर दुकानें तो संचालित की जाती है लेकिन इन्हें आज भी ग्लैमर से नहीं जोड़ा गया। इसके कारण सक्षम ग्राहक छोटी दुकानों पर नहीं पहुंच पाते और सामान्य ग्राहकों को इनकी कीमत अधिक लगती है। सक्षम ग्राहकों के लायक इसका बाजार तैयार करने की जरूरत है।

प्रचार-प्रसार- मप्र हस्तशिल्प विकास निगम जैसे उपक्रम हस्तकला को बढ़ावा देने के लिए सीधे जिम्मेदार हैं। समय-समय इसके लिए गतिविधियां भी होती हैं, लेकिन बाजार के बदलते टे्रंड की तुलना में इनकी कार्यप्रणाली पुराने ढर्रे पर ही है। जनता से कला को जोडऩे के लिए खास प्रयास नहीं होते, न ही प्रचार-प्रसार किया जाता है। निगम कारखानों से भी सीधे उत्पादा खरीदता है लेकिन इसकी दर काफी कम होती है।

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मार्केटिंग- भैरवगढ़ प्रिंट के अपेक्षित नहीं बढऩे के पीछे एक बड़ा कारण मार्केंटिंग की कमी है। इसके उत्पाद की मार्केटिंग न के बराबर है। दुकान काउंटर के अलावा हस्तशिल्प मेले में ही इसके उत्पाद नजर आते हैं। बड़ी कंपनियों से टाइअप कर इसे नए बाजार के लिए तैयार किया जा सकता है।

अंबानी की बेटी की शादी में भैरवगढ़ से साडि़यां

भैरवगढ़ प्रिंट के प्रोडक्ट कितने खास हैं, यह इससे ही पता चलता है कि हाल में मुकेश अंबानी की बेटी की शादी में मेहमानों को उपहार देने के लिए भैरवगढ़ प्रिंट की साडि़यां भिजवाई गई थीं। कारखाना संचालक अब्दुल माजिद बताते हैं कि शादी में महमानों को उपहार देने देशभर से प्रसिद्ध व आकर्षक हैंडलूम आइटम चुने गए थे। अब्दुल माजिद के उत्पादों को भी इसके लिए पसंद किया गया और उनके द्वारा बनाई ३३ में से १७ साडि़यां व ५ दुपट्टे शादी के लिए खरीदे गए। वर्तमान में भैरवगढ़ पिं्रट के उत्पाद देशभर में सप्लाई होते हैं। इसमें मुंबई, बेंगलूरु, अहमदाबाद, दिल्ली जैसे बड़े शहरों में इनकी खासी डिमांड हैं। बड़े बाजारों में भैरवगढ़ प्रिंट की ५ हजार रुपए से अधिक की साडि़यां उपलब्ध हैं।

कारीगरों की कमी से उत्पाद कम हुआ

कारखाना संचालक मोहम्मद शहजाद छिपा बताते हैं, भैरावगढ़ प्रिंट की आज भी काफी मांग है लेकिन बाजार में तालमेल बैठाना मुश्किल हो रहा है। इस खूबी हस्तकला है और आज कारीगर मिलना मुश्किल हो रहे हैं। नए कारीगर तैयार नहीं हो रहे, जो पुराने हैं उनमें से भी कम ही काम करते हैं। इधर जीएसटी लगने से लागत पहले से काफी बढ़ गई है। छापे के लिए कारखाने में चार टेबल हैं, जिनमें से दो खाली ही पड़ी रहती है। उत्पादन हो या न हो, कारखाने का स्थायी खर्च तो वहन करना ही है। इस कारण कुछ कारखाने बंद हो चुके हैं। हमारा पुश्तैनी काम हैं इसलिए हम इसे चलाए हुए हैं।

संभावना बहुत, थोड़े बदलाव की जरूरत है

सैय्यद अब्दुल माजिद भैरवगढ़ के उन व्यवासइयों में से एक हैं, जिन्होंने बाजार के बदलते रूख के साथ तालमेल जमाने की कोशिश की। वे कहते हैं, भैरवगढ़ प्रिंट को उसकी विश्वसनीयता और अन्य खूबियों के कारण काफी पसंद किया जाता है। इसलिए इसके विकास की संभावनाएं काफी हैं लेकिन थोड़े बदलाव की भी जरूरत है। बाजार में कौन सी डिजाइन का चलन है, ग्राहक क्या चाहते हैं, इन्हें समझकर प्रोडक्शन तैयार करना होगा। अब्दलु माजिद ने भी कुछ वर्ष पूर्व इंडोनेशिया जाकर इंडोनेशियन बुटीक प्रिंट सीखा और भैरवगढ़ प्रिंट में वे इसका काफी उपयोग कर रहे हैं। बाजार में इसकी अच्छी कीमत भी मिलती है।

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