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जब धर्म की रक्षा के लिए अखाड़ों के संतो ने उठाये शास्त्र के साथ शस्त्र

संत योद्धाओं ने विरोधियों के हमले से बचने के लिए युद्धकला का प्रशिक्षण लिया। उत्तर मध्य काल में मुगल शासन कमजोर हुआ तो संन्यासी योद्धाओं ने ईरानी, अफगान राजपूत और मराठा शासकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई।

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Lalit Saxena

Apr 15, 2016

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उज्जैन.सिंहस्थ में उन अखाड़ों के संत योद्धा भी मौजूद हैं, जिन्होंने प्राचीन काल में धर्म-संस्कृति की रक्षा के लिए न सिर्फ शास्त्र पढ़े, बल्कि जरूरत पडऩे पर शस्त्र भी उठाया। आदि शंकराचार्य ने इसी मकसद से दशनामी योद्धा संन्यासियों के अखाड़े विकसित किए। इन संत योद्धाओं ने विरोधियों के हमले से बचने के लिए युद्धकला का प्रशिक्षण लिया। उत्तर मध्य काल में मुगल शासन कमजोर हुआ तो संन्यासी योद्धाओं ने ईरानी, अफगान राजपूत और मराठा शासकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई।

दशनामी अखाड़े की वीरगाथा
केरल के शैव संत जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने संतों को शस्त्र प्रशिक्षण देने की शुरुआत की। उन्होंने दशनामी योद्धा संन्यासियों के अखाड़े विकसित किए। संन्यासियों के इस संगठन का मूलमन्त्र था, अग्रतरू यतुरोवेदारू पृष्ठतरू सशरं धनुरू। द्वाम्यामपि समर्थोस्मि शापादपि शरादपि। इसका तात्पर्य है कि मेरे आगे चारों वेद हैं, मेरी पीठ पर धनुष-बाण हैं। मैं विरोधी को दोनों तरह से पराजित कर सकता हूं। मैं उसे शाप देकर कुंठित कर सकता हूं और तीखे तीर से भी मार सकता हूं।

कहानी महान योद्धा संत राजेंद्र गिरि की
दशनामी योद्धा संन्यासियों का सबसे पुराना अखाड़ा अटल है। इस अखाड़े के सेनापति राजेन्द्र गिरि सन 1751 में लगभग पचास हजार संन्यासी सैनिकों के साथ प्रयाग आए। इन दिनों फर्रुखाबाद नवाब की फौज ने इलाहाबाद किले पर हमला कर दिया। किलेदार बकाउल्ला राजेंद्र गिरि के पास गया। राजेन्द्र गिरि और उनके नागा योद्धाओं ने किले का फाटक खोल घेरा डालने वाली फौज पर भयंकर हमला किया। अफगान फौज के पांव उखड़ गए। मैदान-ए-जंग को लहूलुहान कर दशनामी संन्यासी किले में वापस लौट गए।

योद्धाओं के लिए निर्धारित है प्रतिज्ञाएं
संतरूपी योद्धाओं के लिए भी कठिन प्रतिज्ञाओं का पालन किया जाना जरुरी हैं। उन्हें दिन में केवल एक बार भोजन करने की छूट है। एक दिन में सात से अधिक घरों में वो भिक्षा नहीं मांग सकते, भूमि पर ही शयन कर सकते हैं। वो सिर्फ गेरुआ वस्त्र ही पहनते हैं।

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