
Education,internet,information,Ujjain,Bhaiyaji Joshi,
उज्जैन. गुरु को दक्षिणा दी जाती है और फीस मांगी जाती है। वर्तमान शिक्षा पद्धति और गुरुकुल परंपरा में यही अंतर है। दोनों में बच्चों के चरित्र निर्माण के लिए उन्हें शिक्षा ग्रहण कराई जाती है, लेकिन भाव में कितनी भिन्नता है। यह उद्गार आरएसएस सहसरकार्यवाह सुरेश भैयाजी जोशी ने विराट गुरुकुल सम्मेलन में समानांतर सत्र ज्ञान यज्ञ में रविवार को व्यक्त किए।
वे बोले कि शिक्षा से केवल ज्ञान प्राप्त नहीं होता संस्कारों में शुद्धता आती है। गुरुकुल केवल आवासीय एवं भोजन व्यवस्था के विद्यालय नहीं हैं बल्कि यह परंपरा का निर्वाह व व्यक्ति को समग्र जीवन आधारित संस्कार देने की पाठशाला है। इंटरनेट पर प्राप्त होने वाली शिक्षा केवल सूचना मात्र है। जोशी ने कहा कि अच्छा गुरु मिलना भाग्य की बात होती है किंतु अच्छा शिष्य मिलना भी संयोग होता है। भारत की गुरुकुल परंपरा को समझ कर दुनिया के अन्य देश इसको अपना रहे है।
पीएस बोले-परंपरा हाशिए पर, हमसे सीख रहे विदेशी
ज्ञानयज्ञ सत्र में संस्कृति विभाग पीएस मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि हमने गुरुकुल शिक्षा को हाशिए पर रख दिया है। लेकिन हमारी परंपराओं से दूसरे देश सीख रहे हैं और इसे अपना रहे हैं। इस पर चिंतन जरूरी है। सत्र को डॉ. शैलेंद्र मेहता ने भी संबोधित किया। वे बोले वर्तमान में विकास के नाम पर अंधी दौड़ मच रही है, जिसनें भारतीय दर्शन एवं विज्ञान की शिक्षा को कमजोर बना दिया है।
गुरुकुलों की शास्त्रीय शिक्षा पद्धति को मुख्यधारा शिक्षा में बदलना होगा
व्यक्ति की सभी समस्याओं का समाधान ज्ञान से होता है। इसके लिए उसका सर्वांगीण विकास आवश्यक है, जो बेहतर शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर है। इसके लिए मौजूदा गुरुकुल की शास्त्रीय शिक्षा पद्धति को फिर से मुख्यधारा की शिक्षा बनाने का प्रयास करना होगा। इसके लिए सरकारों को ध्यान देना होगा। तभी इस परंपरा को पुनस्र्थापित किया जा सकेगा। उज्जैन में चल रहे अंतरराष्ट्रीय विराट गुरुकुल सम्मेलन के दूसरे दिन पांच संकाय आधारित परिचर्चा में विद्वानों ने इन्हीं विषयों पर मंथन किया। यहां से तैयार संकल्प पत्र अब केंद्र व राज्य सरकारों को सौंपा जाएगा। ताकी इस शिक्षा पद्धति को हालिया दौर में प्रासंगिक बनाया रखा जा सके।
चिंतामण रोड स्थित महर्षि सांदीपनि वेद विद्या प्रतिष्ठान में आयोजित विराट गुरुकुल सम्मेलन में गुरुकुल शिक्षण पद्धति के संकाय पाठशाला (ज्ञान निधि), नाट्यशाला (कला), गोशाला (कृषि), वेधशाला (योग), प्रयोगशाला (विज्ञान) पर परिचर्चा हुई। जिनका निष्कर्ष निकला की भारत की महान ऋषि परंपराओं से संबद्ध उन समस्त गुरुकुलों और उनके गुरुओं-आचार्यों ने भारतीय ज्ञान-विज्ञान, कला, कृषि, योग ? आदि की पारंपरिक मशाल को बुझने नहीं दिया है। इंसान के जीवन में इन संकायों की विधाओं का ज्ञान होना चाहिए। भारतीय जीवन दर्शन का मूल आत्मिक चिन्तन, आत्मा की अमरता-दिव्यता तथा जीवन सत्य पर आधारित होना चाहिए।
इन वक्ताओं ने रखे विचार
परिचर्चा में विज्ञान पर वक्ता तेजस्व कुलकर्णी, रतन वशिष्ट, कपिलदेव मिश्रा, नाट्यशाला पर डॉ. सच्चिदानंद जोशी, अमीरचंद, आचार्य वासुदेव कृष्ण शास्त्री नेपाल, आचार्य कृष्णाशास्त्री, गोशाला पर दिनेश मरोठिया, आरपी तिवारी, टीवी कट्टीमनी, गिरीश प्रभुणे, वेधशाला में वक्ता अनिरुद्ध देशपाण्डे, डॉ. प्रतिमा जोशी, डॉ. मोहन लाल छिपा, आचार्य वेदनिष्ठ तथा पाठशाला ज्ञान निधि के वक्ता आचार्य हरिप्रसाद अधिकारी, डॉ. हेमचंद्र तथा आचार्य नीलकंठन ने अपने विचार रखे।
Published on:
30 Apr 2018 08:00 am
बड़ी खबरें
View Allउज्जैन
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
