
रात में उज्जैन में नहीं रुकते ज्योतिरादित्य सिंधिया - (फोटो सोर्स- Jyotiraditya Scindia X Handle)
Jyotiraditya Scindia : उज्जैन में भगवान महाकालेश्वर की आज भादौं मास की अंतिम 'राजसी सवारी' निकाली जा रही है। लाखों भक्तों से शहर पट चुका है। सोमवार को सुबह 6 बजे से ही सवारी मार्ग बंद किया जा चुका है। महाकाल की सवारी के लिए उज्जैन में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई है। राजसी सवारी में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया भी शामिल होंगे। वे सिंधिया स्टेट की परंपरा निभाते हुए महाकाल को पगड़ी भेंट करेंगे। यह परंपरा करीब ढाई सौ वर्ष से चली आ रही है। खास बात यह भी है कि इस दौरान सिंधिया वंश का कोई भी शख्स उज्जैन में रात नहीं रुका। ज्योतिरादित्य सिंधिया भी इस परंपरा को निभा रहे हैं। वे इसकी वजह भी बता चुके हैं।
श्रावण और भादौ में महाकाल की राजसी सवारी का विशेष महत्व है। इसमें महाराजाधिराज महाकाल अपनी प्रजा का हाल जानने के लिए शहर भ्रमण पर निकलते हैं। आज महाकाल की अंतिम राजसी सवारी निकल रही है। इसके लिए सोमवार को पूरे इलाके में गजब का उत्साह देखा जा रहा है। सुबह महाकाल की भस्म आरती की गई। ज्योतिर्लिंग को सजाया गया।
महाकाल सवारी की एक खास बात यह भी है कि इसमें सिंधिया राजघराने का कोई न कोई सदस्य हमेशा शामिल होता है। भादौं की आज की सवारी में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया शामिल हो रहे हैं। वे सिंधिया राजपरिवार के 14वें वंशज के रूप में महाकाल की पूजा की परंपरा निभा रहे हैं।
महाकाल मंदिर का निर्माण सम्राट विक्रमादित्य ने कराया था पर जब दिल्ली में गुलाम वंश का राज हो गया तब 1211 से लेकर 1236 तक शासक रहे शम्सुद्दीन इल्तुतमिश ने इसे तुड़वा दिया। उसने उज्जैन में कुंभ को भी बंद करा दिया था। कहा जाता है कि इल्तुतमिश से बचाने के लिए मंदिर के पुजारियों ने ज्योतिर्लिंग को एक कुंड में छुपा दिया था। मंदिर टूट जाने के बावजूद ज्योतिर्लिंग को पूजा जा रहा।
करीब 500 वर्षों बाद ग्वालियर के मराठा साम्राज्य के सिंधिया राजपरिवार ने मंदिर का नवनिर्माण कराया। रानोजी सिंधिया जब बंगाल विजय के लिए जा रहे थे तब रास्ते में उज्जैन में महाकाल मंदिर की भग्नावस्था देख वे काफी दुखी हुए। उन्होंने तुरंत मंदिर निर्माण का आदेश दे दिया। रानोजी सिंधिया ने अपने अधिकारियों से साफ शब्दों में यह भी कहा कि बंगाल से लौटने तक महाकाल का भव्य मंदिर बन जाना चाहिए। उन्होंने लौटकर ज्योतिर्लिंग को कुंड से बाहर निकालकर मंदिर में विधिवत स्थापित किया।
विशेष बात यह है कि सिंधिया वंश का कोई भी शासक उज्जैन में कभी रात में नहीं रुका। आजादी के बाद राजघराने खत्म हो जाने के बाद भी सिंधिया परिवार ने यह परंपरा निभाई। खुद ज्योतिरादित्य सिंधिया इसकी वजह भी बता चुके हैं। वे कहते हैं कि हमारे पूर्वज जब महाराष्ट्र से निकले तो पहली राजधानी उज्जैन को ही बनाया था। उन्होंने यह तय किया कि उज्जैन के एक ही महाराज हैं- भगवान महाकाल। इसलिए यहां रात में कभी कोई नहीं रुका। उज्जैन में सिंधिया राज परिवार का गृह निवास कभी नहीं रहा।
ज्योतिरादित्य सिंधिया भी उज्जैन आते हैं तो कभी रात्रि में नहीं रुकते। शहर की सीमा के बाहर उनका एक पुश्तैनी महल है जहां परिजन रुकते हैं। सिंधिया परिवार उज्जैन के कई मंदिरों का संरक्षण करता था। राजमाता विजयाराजे सिंधिया भी अपनी आत्मकथा में इसका जिक्र कर चुकी हैं।
Updated on:
08 Sept 2026 06:07 pm
Published on:
07 Sept 2026 02:40 pm
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