
siddhavat
उज्जैन। भारत ही नहीं विश्व के लगभग हर समाज को हम पुरुष प्रधान कह सकते हैं इसलिए कहीं न कहीं सभी माता-पिता के मन में पुत्र प्राप्ति की चाह रहती है। अधिकांश लोग यही मानते हैं कि लड़कियाँ शादी करके अपने ससुराल चली जाती हैं जबकि बेटा उनके बुढ़ापे का सहारा होता है। पूरे प्रदेश में लगभग कई ऐसी जगह हैं जहां पर पुत्र प्राप्ति की मन्नतें मानी जाती हैं। उन्हीं जगहों में एक जगह है उज्जैन के भैरवगढ़ के पूर्व में शिप्रा के तट पर प्रचीन सिद्धवट। इस जगह को शक्तिभेद तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है। पुराणों में भी इस जगह का वर्णन किया गया है।
इन तीन चीजों की मिलती है सिद्धि
इस जगह पर आपको तीन तरह की सिद्धि मिलती है जिनका नाम है संतति संपत्ति और सद्गति। इन तीनों मन्नतों को पूरा करने के लिए यहां पर पूजन किया जाता है। संतति अर्थात पुत्र की प्राप्ति के लिए उल्टा सातिया ( स्वास्तिक ) बनाया जाता है। संपत्ति के लिए वृक्ष पर रक्षा सूत्र बाँधा जाता है। सद्गति अर्थात पितरों के लिए अनुष्ठान किया जाता है। ये वृक्ष तीनों प्रकार की सिद्धि देता है इसीलिए इसे सिद्धवट कहा जाता है।
कटवा दिया था सिद्धवट
कहा ये भी जाता है कि मुगल काल में बादशाहों ने इस क्षेत्र के धार्मिक महत्व को खत्म करने के लिए बरगद के इस वृक्ष नष्ट करने के लिए उस पर लोहे के बहुत मोटे-मोटे तवे जड़वा दिए थे। इसके बाद भी इस वृक्ष के फिर से अंकुर फूट निकले और आज भी ये वृक्ष हरा-भरा है। लोग यहां पर अपनी मन्नतों को पूरा करने के लिए आते हैं।
ऐसी है मान्यता
शहर के ज्योतिषाचार्य पंडित जगदीश शर्मा बताते है कि स्कंद पुराण के अवंतिका खंड इस बात का उल्लेख किया गया है कि उज्जैन के सिद्धवट क्षेत्र में गणेश पुत्र भगवान कार्तिकेय का मुंडन संस्कार हुआ था। यहां का इतिहास बहुत पुराना है। यहां विराजित ज्योतिर्लिंग महाकाल की भस्म आरती की जाती है। यहां के बारे में ऐसा भी कहा जाता है कि माता सती ने आत्मदाह के बाद शिवजी वैरागी हो गए थे और उन्होंने पूरे शरीर पर भस्म रमा ली थी। जिसके बाद से ही उनकी पूजा महाकालेश्वर के रूप में की जाती है।
Published on:
07 Jan 2019 05:20 pm
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