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उज्जैन में अवैध कॉलोनियों पर निगम क्यो कर रहा है ४० लाख खर्च

चुनावी साल में सरकार ने सभी निकायों को साल २०१७ के पहले कटी अवैध कॉलोनियों को वैध करने का लक्ष्य दिया है।

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उज्जैन। चुनावी साल में सरकार ने सभी निकायों को साल २०१७ के पहले कटी अवैध कॉलोनियों को वैध करने का लक्ष्य दिया है। सरकार के तय नियमों अनुसार हर कॉलोनी भौगोलिक परिस्थिति अनुसार मूलभूत जरूरतों, रहवासी परिवार, प्लॉट संख्या व अन्य स्थितियों का सर्वे होना है। इसके लिए नगर निगम ने ४० लाख रुपए का टेंडर जारी किया है, जिसके जरिए कोई एजेंसी तय कर उससे अवैध कॉलोनियों को सर्वे कराया जाएगा।
पहली बार नगर निगम किसी थर्ड पार्टी से अवैध कॉलोनियों को भौगोलिक सर्वे करा रहा है, जो एजेंसी तय होगी उसके सिविल इंजीनियर, आर्किटेक्टस, सर्वेअर व अन्य एक्सपर्ट निगम की ओर से अधिसूचित अवैध कालॉनोयों में जाकर वहां के रोड, नाली, कच्चे-पक्के मकान, हैंडपंप, डे्रनेज, पार्क, खुली भूमि व भूखंड सहित अन्य स्थितियों को रिकॉर्ड पर दर्ज करेंगे। इसी अनुसार निगम प्रशासन कॉलोनी वैध करने संबंधी एस्टीमेट तैयार करेगा।
प्रक्रिया में लगेगा
एक माह
एजेंसी तय करने की प्रक्रिया में करीब एक माह लगेगा। १६ अप्रैल तक संबंधित फर्म टेंडर फॉर्म खरीद सकेगी। फिर तकनीकी बीड होगी फिर फाइनेंशियल। इसके बार चयनित कंपनी को वर्क ऑर्डर होगा और वह सर्वे शुरू करेगी।
नियम में संशोधन
पर रुचि नहीं
हाल ही में सरकार ने कॉलोनाइजर रजिस्ट्रीकरण नियम १९९८ में संशोधन करते हुए अवैध को वैध घोषित करने के नए मापदंड बनाए हैं, जिसके तहत अब २०१२ की बजाय २०१६ से पहले कटी कॉलोनियों को इस दायरे में रखा गया है। इसके मद्देनजर कॉलोनी सेल ने फिर कार्रवाई शुरू कर आवेदन मंगवाए, लेकिन संबंधित कॉलोनाइजर, प्लॉट विक्रेता व रहवासियों ने कोई रुचि नहीं ली।
वैध होने से ये लाभ
कॉलोनी अवैध होने के चलते बैंकों से ऋण नहीं मिल पाता। वैध होने पर ये समस्या दूर होगी।
नगर निगम अवैध कॉलोनियों में विकास कार्य नहीं कर सकता। वैध होने के बाद निगम मद से कार्य हो सकेंगे।
मूलभूत सुविधाओं जैसे सफाई, पानी, स्ट्रीट लाइट की समस्याएं दूर होंगी।
कॉलोनी वैध होने से संबंधित कॉलोनी में भूखंड-भवन के दाम में २० फीसदी तक इजाफा हो सकता है।
संपत्ति नामांतरण आसानी से संपादित हो सकता है।
राह मेंं नियमों का रोड़ा
अवैध कॉलोनियों को वैध करने का प्रावधान २०१३ से बना है।
प्रक्रिया व मापदंड जटिल होने से इस प्रक्रिया में अधिक लोग लाभान्वित नहीं हो पाते।
विकास शुल्क के नाम पर निगम भारी राशि मांगता है।
क्योंकि अवैध कॉलोनियों खेत, कृषि, तालाब व अन्य भूमियों पर बगैर किसी प्लानिंग कटी है।
मूलभूत सुविधाएं जुटाने में करोड़ों का खर्च होना है। सरकार आधी रकम रहवासियों से चाहती है। इनके अधिकांश निवासी बेहद निर्धन व कमजोर तबके व कम पढ़े लिखे हैं।
कॉलोनाइजर प्लॉट बेच कमाई कर चुके, इससे वे ध्यान देते नहीं और रहवासी इतनी रकम एकत्रित नहीं कर पाते।