15 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

डेढ़ दशक बाद फिर भारतीय क्रिकेट पर मुंबई खेमे का कब्जा

रवि शास्त्री को टीम इंडिया का कोच बनाए जाना एक बार फिर से क्रिकेट पर मुंबई खेमे के कब्जे की कहानी जैसा लगता है। क्रिकेट के मुंबई दौर की आहट साफ सुनी जा सकती है।

3 min read
Google source verification

image

lalit fulara

Jul 13, 2017

Ravi Shastri, Sunil Gavaskar

Ravi Shastri, Sunil Gavaskar

मुंबई। भारतीय क्रिकेट और मुंबई हमेशा से एक दूसरे के पर्याय माने जाते हैं। भारतीय क्रिकेट में खिलाडियों से लेकर उसके प्रशासनिक अमले में हमेशा से मुंबई के लोग हावी रहे हैं। एक समय था भारतीय टीम में शामिल होने वाले खिलाडिय़ों और उसके प्रशासनिक अमले में मुंबई ही हावी रहता था। भारत में क्रिकेट की शुरुआत तो अंग्रेजों के समय में हुई, लेकिन जैसे-जैसे ये खेल आम जनजीवन में अपनी जगह बनाता गया इसको एक क्षेत्र तक सीमित कर दिया गया। क्रिकेट के शुरूआती दौर में मुंबई और बड़ौदा खेमे का ही कब्जा रहता था, जो क्रिकेट के प्रशासन में अपनी मर्जी से चलाता था। खिलाडिय़ों के चयन तक में उसके आधार को देखा जाता था कि यह खिलाड़ी देश के किस कोने से आया है।

ravi shastri sunil gavaskar के लिए चित्र परिणाम


ये भी पढ़ें-

मजबूत आधार
मुंबई, भारतीय क्रिकेट का बॉस ऐसे ही नहीं बना। क्रिकेट में उसके बॉस बनने के लिए मजबूत आधार भी था। एक समय देश का प्रत्येक अच्छा खिलाड़ी वहीं से होता था। सुनील गावस्कर, दिलीप वेंगसकर, किरण मोरे, सचिन तेंदुलकर रवि शास्त्री ऐसे न जाने कितने नाम हैं जिन्होंने क्रिकेट में मुंबई का कब्जा बरकरार रखने में मदद की। खेल से सन्यास लेने के बाद ये खिलाड़ी किसी न किसी तरीके से बोर्ड से जुड़े रहते थे, जिसका फायदा इन्हें बोर्ड के तमाम दायित्य के रूप में मिलता था।

ये भी पढ़ें-


जिद पर अड़ा हरियाणा का जाट

ये भी पढ़ें

image
मुंबई खेमे को प्रशासनिक आधार पर चुनौती दी बंगाल क्रिकेट एशोसिएसन के अध्यक्ष जगमोहन डालमिया ने। जगमोहन डालमिया ने भारतीय क्रिकेट को इस तरह बदला कि उनकी गिनती एक कुशल प्रशासक के रूप में होने लगी। खेल के स्तर पर मुंबई खेमे को चुनौती दी कपिलदेव ने। हरियाणा का यह खिलाड़ी एक बेहतरीन आलराउंडर था। अपने बेहतरीन खेल की बदौलत हरियाणा का यह जाट टीम इंडिया का कप्तान बना और इंडिया ने उसकी कप्तानी में ही अपना पहला विश्वकप भी जीता। कपिलदेव के बाद मुंबई खेमे को सबसे तगड़ी चुनौती दी टीम इंडिया के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली ने। सौरव गांगुली को जगमोहन डालमिया का करीबी माना जाता था, जिन्होंने गांगुली का हर कदम पर साथ दिया।

sachin tendulkar के लिए चित्र परिणाम
ये भी पढ़ें-

संबंधित खबरें



बंगाल बना चुनौती
भारतीय क्रिकेट में ये वो दौर था जब क्रिकेट एसोसिएशन में जगमोहन डालमिया की तूती बोलती थी। इसका कारण था की भारतीय क्रिकेट ने पैसे का स्वाद चख लिया था। क्रिकेट में पैसे को मिलाने का श्रेय डालमिया को ही जाता है जिसमें उन्होंने 1996 विश्वकप की मेजबानी भारत को दिलाई और विश्व क्रिकेट में भारत के दरवाजे खोले।

saurabh ganguly के लिए चित्र परिणाम


गांगुली बने क्रिकेट के ‘दादा’
सौरव गांगुली के कप्तान बनने के बाद से भारतीय क्रिकेट टीम का नक्शा बदलना शुरू हुआ। कई नए खिलाड़ी आए कुछ पुरानों को चलता किया गया। गांगुली ने अपनी मर्जी की टीम बनाई और 2003 के विश्वकप में भारत ने फाइनल खेला। वीरेंद्र सहवाग, युवराज सिंह, हरभजन सिंह, गौतम गम्भीर और देश के सबसे सफल कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की खोज का श्रेय सौरव गांगुली को दिया जाता है। सौरव गांगुली के बाद इस चुनौती को बरकरार रखा रांची जैसे छोटे शहर से आए महेंद्र सिंह धोनी ने। धोनी लगातार 10 साल तक भारतीय टीम के कप्तान रहे और कई अच्छे व बेहतरीन खिलाडिय़ों को टीम में लेकर आए।

श्रीनिवासन बने भारतीय क्रिकेट के मालिक
खिलाडिय़ों के इतर प्रशासनिक स्तर पर चुनौती देने वाले जगमोहन डालमिया के बाद एक बार फिर मुम्बईया खेमा हावी होता दिखा तो इस बार दक्षिण भारत के एन.श्रीनिवासन चुनौती देते नजर आए। एन. श्रीनिवासन ने तो भारतीय क्रिकेट को जमीन से उठाकर आसमान तक पहुंचाया। डालमिया के दौर में बीसीसीआई ने पैसे को पकड़ा था तो श्रीनिवासन के दौर में अकूत दौलत कमाई और विश्व के सबसे धनी क्रिकेट बोर्ड में शामिल हुआ।

शास्त्री-जहीर खान की वापसी से फिर हावी हुआ मुंबई खेमा
रवि शास्त्री को टीम इंडिया का कोच बनाए जाना एक बार फिर से क्रिकेट पर मुंबई खेमे के कब्जे की कहानी जैसा लगता है। क्रिकेट के मुंबई दौर की आहट साफ सुनी जा सकती है। शास्त्री को कोच बनाने में चयन समिति के सदस्य सचिन तेंदुलकर का योगदान माना जा रहा है जिसमें सचिन ने शास्त्री का समर्थन किया था।