उन्नाव. परशुराम लक्षमण संवाद बहुत ही ज्ञान वर्धक है। जिसमे कभी-कभी वह बाते भी सीखने को मिलती हैं, जो वर्तमान में बेहद उपयोगी होती हैं। आज का युवा वर्ग इससे बहुत ही तेज़ी से जुड़ रहा है। परशुराम का पाठ करने वाले आशीष मिश्र पुत्र स्व श्री संतोष मिश्र निवासी सफीपुर ने पत्रिका से बातचीत के दौरान उपरोक्त विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि मेरे पिताजी श्री संतोष मित्र भी परशुराम का पाठ करते थे। अपने पिताजी के सानिध्य में परशुरामी का अभिनय सीखने वाले आशीष मिश्र ने बताया कि विगत 3 वर्षों से वह परशुराम का पाठ कर रहे हैं और अब तक 50 स्टेज कर चुका हूं।
ज्ञानवर्धक होती है परशुरामी
उन्होंने बताया कि पिताजी के साथ रहकर उन्हीं के साहित्य का अध्ययन किया। अपने पहले स्टेज मंचन का जिक्र करते हुए आशीष मिश्र ने बताया कि सफीपुर के ग्राम पंचायत ओसिया डकौली में था।जब मैंने समाधि लगाई, तो वहां पर कई लोगो की अश्रुधरा बहने लगी। कार्यक्रम समापन के बाद उन लोगो से बात की तो सभी ने बताया कि ऐसा लग रहा थी कि आप नही बल्कि आपके पिता जी आ गए हो। उन्ही की याद में सभी भावुक हो गए। एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि पिता जी के समय के संवाद और आज के संवाद में बहुत नही लेकिन कुछ परिवर्तन हुआ है। अब रामचरित मानस के आधार पर ही संवाद होता है। जबकि पहले बहुत ही ज्ञान वर्धक रहता था। काफी कुछ सीखने को मिलता था उन्होंने बताया कि परशुराम लक्ष्मण संवाद को सीखने में युवाओं में विशेष उत्साह देखा जाता है। आशीष मिश्र ने बताया कि परशुराम लक्ष्मण संवाद वैसे तो 4 से 5 घंटे में समाप्त हो जाता है। परंतु कभी-कभी यह 7 घंटे तक खिंच जाता है। परशुराम लक्ष्मण परशुराम संवाद के दौरान रावण, बाणासुर की झांकी भी दिखाई जाती है।
सीता स्वयंवर में आए थे देश देशांतर से राजा
धनुष यज्ञ के आयोजन में जनक की मिथिला में देश देशांतर के लोग आते है। जिसमें राजा जनक ने धनुष तोड़ने वाले के साथ मिथिलेश कुमारी के विवाह का प्रण किया था। लेकिन जिसे गुरु विश्वामित्र की अनुकम्पा से दसरथ पुत्र श्री राम धनुष को तोड़ पाते है। धनुष टूटने की ध्वनि सुनकर महेन्द्राचल पर्वत से परशुराम जी का आगमन मिथिला में होता है। जिन्हें आया देखकर स्वयंबर में भाग लेने आए राजा गण भयभीत हो जाते है। उनके क्रोध को श्री राम जी शांत करने का प्रयास करते है। तभी बीच मे लक्ष्मण जी बोल देते है। फिर परशुराम जी का क्रोध अत्यधिक हो जाता है। वह घोषणा करते है कि अब लक्ष्मण के प्राण को तिरोहित कर देंगे। अपने परशु से तब श्री राम जी उनके आगे हाथ जोड़कर विनती करते है कि आप मुझे मार दे। लेकिन भैया को नही, अपराधी मैं हूं।
भाइयो का अनुपम प्रेम देखकर परशुराम जी का क्रोध शांत हो जाता और भृगु चरण हृदय धारण किये, श्री राम को पहचान जाते हैं और उनकी जय करते हुए दोबारा तप के लिए चले जाते है।
वीर वही जो भेंट चढ़ा दे चढ़ती हुई जवानी को
इस मौके पर उन्होंने परशुराम लक्ष्मण संवाद के दौरान कही जाने वाले कविता रूपी संवादों को सुनाया उन्होंने एक वीर रस की कविता सुनाते हुए कहा कि-
वीर वही जो भेंट चढ़ा दो चढ़ती हुई जवानी को,
वीर वही जो समरांगण में भरे भाव तूफानी,
सुनते ही हुंकार जिन्होंने खोल दिए बुझ बंधन,
सुनते ही टंकार तोड़ दे जो जग के गठबंधन,
याद करो सौमित्र महा वीरों की अमर कहानी,
वीर वही जो भेंट चढ़ा दे चढ़ती हुई जवानी।
ज्वालामुखी को भी जला सकता हूं मैं
दोपहरी का तपता सूरज हूं मैं,
हिमगिरी को भी पानी बना सकता हूं मैं,
ज्वालामुखी का कोई महा नहीं,
ज्वालामुखी को भी जला सकता हूं मैं।
अस्त्र बल, शस्त्र बल और बाहुबल से सबल
तपश्चर्या का बल ब्रह्म बल से है प्रबल,
अजर हूं, अमर सत्य धारी हूं मैं,
अविनाशी हूं, ब्रह्मचारी हूं मैं,
विप्र हूं, साथ में वेदपाठी हूं मैं,
संत मुनियों की रक्षा की लाठी हूं मैं,
दीन दुखियों को हरदम बचाता रहा,
पर धर्म द्रोही जनों को मिटाता रहा,
जो हम से लड़े वह रहे ही नहीं,
और जो जब-जब भिड़े वह बचे ही नहीं।