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ऐसे थे जिले के प्रथम सांसद पं. विशंभर दयाल त्रिपाठी – शिक्षा के उत्थान में जमीन व भवन दिया दान, जन्मस्थली खंडहर

जिले के पहले सांसद पंडित विशंभर दयाल त्रिपाठी किसान और शिक्षा के उत्थान के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया, डीएसएन कॉलेज डीबीडीटी बीडीटी जैसे कालेजों की स्थापना की

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ऐसे थे जिले के प्रथम सांसद पं. विशंभर दयाल त्रिपाठी - शिक्षा के उत्थान में जमीन व भवन दिया दान, जन्मस्थली खंडहर

ऐसे थे जिले के प्रथम सांसद पं. विशंभर दयाल त्रिपाठी - शिक्षा के उत्थान में जमीन व भवन दिया दान, जन्मस्थली खंडहर

पत्रिका न्यूज़ नेटवर्क

उन्नाव. जिले के पहले सांसद पंडित विशंभर दयाल त्रिपाठी जिन्होंने जमीदारी उन्मूलन की मांग को लेकर एक लाख से अधिक किसानों के साथ पैदल मार्च किया था। शिक्षा के उत्थान में कई महत्वपूर्ण शैक्षिक संस्थाओं की स्थापना की। आज किसानों के मसीहा की जन्मस्थली उपेक्षा की शिकार है। पैतृक आवास आज टीला में तब्दील हो गया है। समाधि स्थल तक जाने के लिए मार्ग भी नहीं बनाया गया। लोगों ने केंद्र और प्रदेश सरकार को इस संबंध में पत्र लिखकर मांग भी की। लेकिन किसानों के हिमायती और जिले के पहले सांसद के पक्ष में किसी भी सरकार ने आगे बढ़कर काम नहीं किया। अपनी जमीन व भवन दान देकर शिक्षण संस्थान खुलवाने वाले पंडित जी के परिवार के सदस्य की आर्थिक स्थिति आज ठीक नहीं हैं।

बांगरमऊ के रहने वाले थे जिले के पहले सांसद

आजादी की लड़ाई में प्रमुख भूमिका निभाने वाले जिले के पहले सांसद पंडित विशंभर दयाल त्रिपाठी का जन्म 5 अक्टूबर 1899 में बांगरमऊ के महा ब्रह्मानान टोला में हुआ था। पिता पंडित गया प्रसाद त्रिपाठी और मां कौशल्या देवी के पुत्र की प्राथमिक शिक्षा बांगरमऊ के ही प्राथमिक विद्यालय में हुई थी। उच्च शिक्षा के लिए सीतापुर के बाद काशी विश्वविद्यालय की यात्रा की। 1952 के पहले लोकसभा चुनाव में उन्हें जीत हासिल हुई। इसके बाद 1957 में उन्होंने दूसरी बार रिकॉर्ड मतों से जीत हासिल की। पंडित विशंभर दयाल त्रिपाठी ने शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। डीएसएन स्नातकोत्तर महाविद्यालय, डीबीडीटी इंटर कॉलेज उन्नाव, बीडीटी इंटर कॉलेज मियागंज की स्थापना उन्होंने ही की थी। शिक्षा के उत्थान के लिए उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान देते हुए अपने भवन और जमीन भी दान दिए।

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वकालत की पढ़ाई के बाद कूदे आजादी की लड़ाई में

काशी विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण करने के बाद 1919 में पंडित विशंभर दयाल त्रिपाठी स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। वकालत की पढ़ाई पढ़ने के बाद भी उन्होंने देश की आजादी में अपनी सहभागिता की। किसानों के हित में उन्होंने आवाज उठाई। जमीदारी प्रथा को खत्म करने के लिए उन्होंने अब तक का सबसे बड़ा पैदल मार्ग लखनऊ तक किया। जिसमें एक लाख से अधिक किसानों ने भाग लिया। समाज के प्रति समर्पण का भाव रखने वाले विशंभर दयाल त्रिपाठी का परिवार आज अभाव में है। अपनी जमीन दान देकर शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले पंडित जी का परिवार शासन प्रशासन की उदासीनता को झेल रहे हैं। 15 अगस्त 1999 को पंडित विशंभर दयाल त्रिपाठी की याद में केंद्र सरकार ने डाक टिकट भी जारी किया था। लेकिन जमीनी हकीकत में एक पैसे का काम नहीं किया गया। 18 नवंबर 1959 को दिल्ली में ही उन्होंने अंतिम सांस ली।


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