
अर्चना देवी बाएं में ट्रॉफी के साथ और दाएं में अपनी मां के साथ
रविवार को हुए अंडर-19 महिला टी20 वर्ल्ड कप के फाइनल में भारत ने इंग्लैंड को 7 विकेट से मात दी है। इंग्लैंड ने 120 बॉल में 69 रनों का लक्ष्य दिया। जो इंडिया ने 3 विकट खोकर 14 ओवर में ही पूरा कर पहला अंडर 19 टी20 विश्व कप जीत लिया।
भारत की इस जीत में इंडिया की बॉलर अर्चना देवी का भी अहम रोल रहा। अर्चना ने 3 ओवर में 17 रन देकर 2 विकेट हासिल किए और इंग्लैंड की कमर तोड़ दी। इस बड़ी जीत के बाद अर्चना ने अपनी सफलता का सारा योगदान अपनी मां को दिया।
एक तरफ गरीबी थी तो दूसरी तरफ रिश्तेदारों के ताने
अर्चना आज पूरे देश में एक चेहरा बन गई हैं। हर कोई उनकी कामयाबी को सलाम कर रहा है। उनकी मां सावित्री देवी की तारीफें हो रही हैं। अर्चना के लिए ये सफर हमेशा से आसान नहीं था। सावित्री देवी ने जब पति और बेटे की मौत के बाद अर्चना को क्रिकेट खिलाने की ठानी तो उन्हें बहुत कुछ सुनना पड़ा। एक तरफ गरीबी थी तो दूसरी तरफ रिश्तेदारों और पड़ोसियों के ताने।
बेहद गरीबी में अर्चना का बचपन बीता है। एक वक्त ऐसा भी था जब अर्चना के परिवार को 2 वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती थी। उनकी मां गाय पालकर और खेत में काम करके किसी तरह से परिवार को चलाती थीं। जो एक झोपड़ी जैसे मकान में रहता है।
मां की जिद ने अर्चना को बनाया क्रिकेटर
अर्चना देवी के क्रिकेटर बनने के पीछे सबसे बड़ा हाथ उनकी मां सावित्री देवी का रहा है। इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में उनकी मां सावित्री देवी ने बताया कि तमाम मुश्किलों से और गांव के लोगों की ताने सुनने के बाद भी उन्होंने ठान लिया था। अर्चना को एक दिन इतना बड़ा क्रिकेटर बनाना है जिसे दुनिया जान सके। लोगों का क्या है आज कुछ बोलते हैं कल कुछ बोलेंगे। मैंने ठान लिया था कि अर्चना वहीं बनेगी जिसमें वह अच्छी है।
लोगों ने सावित्री को डायन कहना कर दिया था शुरू
उन्नाव के केरतई पुरवा गांव में सावित्री देवी के पति शिवराम की मौत कैंसर से 2007 हो गई थी। वहीं, 2017 में उनके छोटे बेटे बुद्धिमान सिंह की मौत सांप काटने से हो गई। पूरा गांव ये कहने लगा कि सावित्री की वजह से ये दोनों मौत हुई हैं। सावित्री तो डायन है। लोग मुंह पर कह जाते थे कि ये तो पति और बेटे को खा गई।
सावित्री ने ये सब सुना लेकिन खुद को टूटने नहीं दिया। पति और बेटे की मौत के बाद उन्होंने अपनी बेटी को कुछ बना लेने की ठानी। गाय का दूध बेचकर जमा किए गए जो कुछ पैसे थे, वो निकाले और अर्चना का एडमिशन गांव से 345 किलोमीटर दूर मुरादाबाद में कराया।
लोग कहते थे- लड़की को शादी कर ससुराल भेजो
अर्चना का एडमिशन लड़कियों के बोर्डिंग स्कूल 'कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय' में हुआ तो लोगों ने कहा था कि तुम अपनी बेटी को गलत रास्ते पर भेज रही हो। पहले पति को खा गई फिर बेटे को अब अपनी बेटी को भी मारना चाहती हो।
सावित्री देवी को रिश्तेदारों ने भी कहा कि बेटी है शादी करो और ससुराल भेजो। घर के काम सिखाओ लड़की को लड़की की तरह रखो। सावित्री बताती हैं, जब अर्चना का एडमिशन हुआ था उस समय बस में आने-जाने का किराया 30 रुपए था वह भी बड़ी मुश्किल से जुगाड़ हो पाता था।
टीचर पूनम गुप्ता ने पहचाना क्रिकेट का हुनर
अर्चना को कस्तूरबा गांधी स्कूल में क्रिकेट खेलते हुए टीचर पूनम गुप्ता ने देखा। पूनम ने पहचान लिया कि ये लड़की बड़ी खिलाड़ी बन सकती है। वो सीधे अर्चना की मां से बात करने पहुंची और अपने साथी ही ट्रेनिंग सेंटर ले आईं। रिश्तेदारों ने सावित्री के इस फैसले का भी विरोध किया लेकिन यही वो फैसला था जिसने अर्चना की किस्मत बदल दी। अर्चना ट्रेनिंग सेंटर गईं तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। मशहूर शायर बशीर बद्र का ये शेर उन पर फिट बैठता है-
जिस दिन से चला हूं मिरी मंज़िल पे नज़र है
आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा।
आज बेटी को देखने के लिए घर में लगा है जमावड़ा
रविवार को अर्चना को टीवी पर खेलते देखने के लिए सारा गांव सावित्री के टूटे-फूटे घर में जमा हो गया। वो कहती हैं, आज मेरे घर में वो लोग भी बैठे हुए हैं जो मेरे घर का पानी तक नहीं पीते थे। मैं अब उन बातों को याद नहीं करना चाहती। आज मेरी बेटी ने जो उपलब्धि हासिल की है, वो मेरी नहीं पूरे गांव और देश की है। मैं अब पुरानी बातों को याद कर परेशान नहीं होना चाहती।
Updated on:
30 Jan 2023 12:20 pm
Published on:
30 Jan 2023 10:21 am

