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यूपी की सियासत में कितना जरूरी है ‘दलित वोट बैंक’? सीएम कुर्सी के लिए साबित होता है गेमचेंजर

डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती पर यूपी में सियासत तेज हो गई है। दलित वोट बैंक 2027 चुनाव का निर्णायक फैक्टर माना जा रहा है।

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लखनऊ

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Anuj Singh

Apr 14, 2026

2027 से पहले दलित वोट बैंक पर महासंग्राम

2027 से पहले दलित वोट बैंक पर महासंग्राम

UP Politics: डॉ. भीमराव आंबेडकर की 135वीं जयंती (14 अप्रैल 2026) पर उत्तर प्रदेश की सियासत गरम हो गई है। बहुजन समाज पार्टी ने लखनऊ में भव्य शक्ति प्रदर्शन की तैयारी की है। समाजवादी पार्टी और भाजपा भी बड़े कार्यक्रम आयोजित कर रही हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बाबा साहेब की जयंती क्यों अचानक इतनी अहम हो गई? इसका जवाब है, 21 फीसदी दलित वोट बैंक। यह वोट बैंक सीएम कुर्सी का गेमचेंजर साबित होता है। उत्तर प्रदेश में कुल 403 विधानसभा सीटें हैं। इनमें 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। दलित आबादी राज्य की कुल जनसंख्या का करीब 21 फीसदी है, यानी लगभग 3.20 करोड़ वोटर। ये वोट सिर्फ आरक्षित सीटों पर ही नहीं, बल्कि 150 से ज्यादा सामान्य सीटों पर भी निर्णायक हैं। पूर्वांचल और बुंदेलखंड में कई सीटों पर दलित वोटर 30 फीसदी से ज्यादा हैं। अगर दलित वोट एक तरफ हो जाए, तो 80-100 सीटें सीधे प्रभावित होती हैं।

2022 के चुनाव में सीटों का गणित

2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 255 सीटें जीतीं (41.29% वोट), जबकि सपा को 111 सीटें (32%) मिलीं। बसपा का वोट शेयर 22% से गिरकर 13% रह गया और सिर्फ 1 सीट मिली। भाजपा ने ज्यादातर SC आरक्षित सीटों पर कब्जा किया, क्योंकि गैर-जाटव दलित (पासी, वाल्मीकि आदि) उसके साथ थे। जाटवदलित अभी भी BSP के साथ मजबूत हैं, लेकिन उनका वोट बंट गया। मेजॉरिटी के लिए 202 सीटें चाहिए। अगर बसपा दलित वोट 70-80% कंसोलिडेट कर ले, तो वह अकेले 100+ सीटें ला सकती है। सपा की PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) रणनीति 2024 लोकसभा में काम आई, लेकिन 2027 में उसे दलित-मुस्लिम गठजोड़ मजबूत करना होगा। भाजपा ने गैर-जाटव दलितों को कल्याण योजनाओं (जैसे आंबेडकर मूर्ति विकास योजना, छत्र लगवाना) से जोड़ा है।

क्यों गेमचेंजर है दलित वोट?

दलित वोट बैंक बिना किसी बड़े गठबंधन के बहुमत नहीं देता, लेकिन बिना इसके बहुमत टूट जाता है। 2007 में बसपाा ने दलित-मुस्लिम-ब्राह्मण फॉर्मूला से सरकार बनाई। 2017 में भाजपा ने दलित समर्थन से 312 सीटें जीतीं। 2022 में बसपा के कमजोर होने से भाजपा को फायदा हुआ। अब 2027 में दलित वोट बंटा, तो भाजपा को फायदा, एकजुट हुआ तो बसपा या सपा गठबंधन को। जयंती पर BSP का शक्ति प्रदर्शन मायावती का संदेश है कि दलितों का असली चेहरा हम हैं। अखिलेश यादव गांव-गांव संवाद और संविधान की बात कर दलितों को आकर्षित कर रहे हैं। भाजपा योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में आंबेडकर की मूर्तियों पर छत्र लगवा रही है और कल्याण योजनाएं चला रही है।

सीएम पद का फैसला

21 फीसदी दलित वोट 2027 में सीएम पद का फैसला करेगा। जो पार्टी इसे अपनी तरफ मोड़ लेगी, वही लखनऊ की गद्दी पर काबिज होगी। तीनों पार्टियां जानती हैं, बाबा साहेब की जयंती सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि वोट की जंग का आगाज है।