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संदिग्धों की शरणस्थली बनता जा रहा देवबंद, दोषी कौन

अगर फतवों को छोड़ दें तो आजकल संदिग्धों के मामलों में भी देवबंद का काफी नाम आ रहा है

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संदिग्धों की शरणस्थली बनता जा रहा देवबंद, दोषी कौन

टिप्पणी/शरद अस्थाना

(sharad.asthana@in.patrika.com)

देवबंद का नाम आते ही हमारे जेहन में देश के सबसे बड़े इस्लामिक शिक्षा के केंद्र दारुल उलूम और वहां से जारी होने वाले फतवों की तस्वीर सामने आ जाती है। हर छोटे-बड़े मामलों पर देवबंदी उलेमाओं की राय काफी अहम होती है। दुनिया भर में बैठे मुस्लिम अपनी सवाल भेजकर इनसे सलाह-मशविरा करते हैं। अगर फतवों को छोड़ दें तो आजकल संदिग्धों के मामलों में भी सहारनपुर के इस नगर का काफी नाम आ रहा है।

अभी हाल ही में इंटेलिजेंस और दिल्ली पुलिस की टीम ने एक संदिग्ध काे पकड़ा था। उसके जासूस होने की भी आशंका जताई गई। और जांच पड़ताल की गई तो पता चला कि वह सऊदी अरब से भारत पहुंचा था लेकिन मूल रूप से बांग्लादेश का रहने वाला है। उसके पास से एक पासपोर्ट मिला। चौंकाने वाली बात यह रही कि यह 2002 में देवबंद से जारी हुआ था। इतना ही नहीं वह काफी समय तक यहां रहा भी है।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब संदिग्धों का देवबंद से नाता निकला हो। इससे पहले भी कई मामले सामने आ चुके हैं। कई तो देवबंद से ही पकड़े गए। इनके पास मिले पासपोर्ट यहां के पते पर थे। अगर देखा जाए तो एक दशक में कई शख्स पकड़े गए, जो देश की सुरक्षा के लिए खतरा हो सकते थे। उनमेंं से ज्यादातर के पास देवबंद के पते का फर्जी पासपोर्ट मिला। इससे खुलासा हुआ कि फर्जी दस्तावेज बनवाने के लिए बांग्लादेश या दूसरे देशों के लोगों के लिए यह पनाहगार बन गया है। अब इनके मंसूबे कोई सही तो होंगे नहीं।

ये तो मात्र कुछ उदाहरण थे, जिससे आप समझ सकते हैं कि देवबंद विदेशी नागरिकों को फर्जी दस्तावेज उपलब्ध कराने और उन्हें पनाह देने का केंद्र बन गया है। अब इतने मामले सामने आने के बाद स्थानीय पुलिस की भी आंख खुली और उसने जांच शुरू की तो पता चला कि कुछ एजेंट देश के इन दुश्मनों की मदद करते थे। चौंकाने वाली जानकारी यह मिली कि संदिग्धों ने इन एजेंट के जरिए पहले फर्जी आधार या कोई और पहचान पत्र बनवाया, जिसके बाद उन्होंने चंद रुपये देकर पासपोर्ट भी ले लिया। इस काम में कुछ पैसों के लिए चंद लोगों ने उनकी मदद कर देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ भी किया। अभी पुलिस ने 19 मई को वहां से म्यांमार निवासी को पकड़ा। उसने भी फर्जी पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था। इतना ही नहीं किराए के मकान को उसने अपना घर और जन्मस्थान देवबंद बताया। वो तो भला हो जो पुलिस तब तक जग चुकी थी।

अब देखा जाए तो अगर स्थानीय पुलिस सजग होती तो शायद ये एजेंट पहले ही पकड़े जाते। ऐसा होने पर देश का कोई भी दुश्मन यहां पर आते ही पकड़ा जाता। अगर किसी संदिग्ध का फर्जी पासपोर्ट 2002 में जारी हुआ हो तो आप खुद ही सरकारी कर्मचारियों की लापरवाही का अंदाजा लगा सकते हैं। मतलब करीब 16 साल या शायद उससे भी ज्यादा समय से ये विदेशी हमारे देश में अवैध तरीके से घुसे हुए हैं। अब सवाल यह उठता है कि अगर पासपोर्ट बिना पुलिस वैरिफिकेशन के नहीं बन सकता है तो इनकी जांच कैसे की गई? इतना ही नहीं पासपोर्ट कार्यालय में भी कहने को दस्तावेजों की गहनता से जांच की जाती है लेकिन इन मामलों में यह गंभीरता कहां गई? अब बात करे आधार या अन्य पहचान पत्रों की, जिनके बिना पासपोर्ट के लिए आवेदन भी नहीं किया जा सकता, तो किस सरकारी कर्मचारी या एजेंट के जरिए ये बन गए? खैर दोषी कोई भी हो लेकिन यह चूक हमारे देश को कितनी भारी पड़ सकती है, इसका शायद अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता है। अगर अब भी पुलिस और पासपोर्ट कार्यालय गंभीर नहीं हुए तो भविष्य में इसका बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।

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