
गोरखपुर मेडिकल कॉलेज
धीरेन्द्र विक्रमादित्य गोपाल
गोरखपुर. पूर्वांचल की माताएं अब गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज के एनआईसीयू में अपने शिशुओं को भर्ती कराने से घबराने लगी हैं। एनआईसीयू को नियोनेटल इंटेंसिव केयर युनिट और हिन्दी में नवजात शिशु सघन चिकित्सा कक्ष कहा जाता है। नवजात शिशुओं के लिए बना यह एनआईसीयू ही बच्चों के लिए काल बन गया है। आंकड़ों पर ही अगर गौर किया जाए तो इस साल 1089 नवजात मौत के मुंह में जा चुके हैं। पिछले तीन दिनों में नियोनेटल वार्ड के 25 नवजात कालकवलित होे गए। इतनी बड़ी संख्या में बच्चों की हुई मौतों पर किसी भी जिम्मेदार को जुंबिश तक नहीं हुई जबकि कुछ दिन पूर्व हुई एक जांच में यहां संक्रमण व अव्यवस्था की बात सामने आ चुकी है। जानकार कहते हैं कि मरने वाले नवजात गरीब परिवारों से ताल्लुक रखते हैं, इसलिए उनके परिजन भी किसी फोरम तक जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते और विधि का विधान मानकर चुप हो जा रहे।
बीआरडी मेडिकल कॉलेज में नवजात शिशुओं की जीवनरक्षा के लिए नियोनेटल वार्ड बना है। डिलेवरी के बाद अगर किसी बच्चे को किसी प्रकार की दिक्कत हो या वह बीमार पड़ जाता है तो उसे नियोनेटल आईसीयू में जीवन रक्षा प्रणाली या स्पेशलिस्ट डॉक्टर व स्टाफ की देखरेख में रखा जाता है ताकि उसका सही ढंग से उपचार हो सके। लेकिन मेडिकल कॉलेज का एनआईसीयू नवजातों का जीवन रक्षा करने में असफल साबित हो रहा। एनआईसीयू में भर्ती होने वाले 35 से 40 प्रतिशत नवजात वापस बाहर की दुनिया नहीं देख पा रहे हैं।
इस साल जनवरी से अगस्त तक का केवल आंकड़ा देखा जाए तो इन आठ महीनों में एनआईसीयू में करीब ढाई हजार नवजात भर्ती किए गए। इनमें से 1089 नवजातों की मौत हो गई। अगर एक दिन का औसत निकाला जाय तो मेडिकल कॉलेज के एनआईसीयू में रोज साढ़े से अधिक बच्चे दम तोड़ रहे हैं। यह आंकड़ा इसलिए भी भयावह है क्योंकि मेडिकल कॉलेज में इंसेफेलाइटिस से आठ महीनों में 181 मौत हुई हैं। एनआईसीयू में नवजातों के मौत का आंकड़ा इससे करीब छह गुना है। लेकिन फिर भी नवजातों की मौत पर जिम्मेदारों की चुप्पी टूटने का नाम नहीं ले रही है।
संक्रमित है एनआईसीयू
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के एनआईसीयू में नवजात को संक्रमण से मुक्त रखने और बेहतर इलाज के लिए भर्ती किया जाता है। लेकिन जुलाई में कराई गई एक जांच में यह तथ्य सामने आ चुका है कि नवजातों का आईसीयू बेहद संक्रमित है। अस्पताल सूत्रों की मानें तो कॉलेज के माइक्रोबायोलॉजी विभाग ने आईसीयू के एक-एक उपकरण की जांच की, फर्श, दीवार आदि के नमूने लेकर जांच की। जांच के बाद विभाग के होश फाख्ता हो गए। यहां कई खतरनाक जीवाणु और विषाणुओं की पुष्टि हुई जो नवजातों के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं। हालांकि, इस रिपोर्ट के आने के बाद एनआईसीयू को विसंक्रमित भी किया गया, लेकिन बच्चों की मौत का सिलसिला नहीं थमा। जानकार यह भी बताते हैं कि एनआईसीयू में काफी अव्यवस्था है। यहां एक-एक बेड पर दो से तीन बच्चों को लेटाया जाता है। यह भी बच्चों के लिए काल बन जाता। वजह यह कि नवजात एक दूसरे को संक्रमित भी कर देते हैं। अलग-अलग बच्चे अलग-अलग बीमारियों की वजह से भर्ती होते हैं, एक साथ रखने से एक दूसरे के लिए काल बन जाते हैं।
व्यवस्था भी है मौतों की वजह
मेडिकल कॉलेज में हो रही मौतों पर कॉलेज के बहुत सारे लोग दुखी हैं। ये आंकड़े उन्हें भी परेशान कर रहे हैं और वह कुछ करना भी चाहते हैं पर मजबूर हैं। मेडिकल कॉलेज के एक वरिष्ठ बताते हैं कि बयानबाजी से ये सिलसिला रुकने वाला नहीं है। पूरी भ्रष्ट व्यवस्था इसके लिए ज़िम्मेदार है। आखिर मेडिकल कॉलेज में आने वालों को कब तक उधार के स्टाफ और ख़राब उपकरण के सहारे बचाने की नाकामयाब कोशिश होती रहेगी। सब जानते हैं कि इसको क्या-क्या जरुरी है पहले उसे तो पूरा कीजिये, मौतें अपने आप रुक जाएगी। एक अन्य जानकार कहते हैं कि उपकरण या तो ख़राब हैं या हैं ही नहीं। व्यवस्था भी पर्याप्त नहीं। स्टाफ की कमी तो है ही ट्रेंड स्टाफ भी कम है। आपको एक पुख्ता व्यवस्था करनी होगी न कि जब जून, जुलाई आये तो दूसरे मेडिकल कॉलेज के कुछ स्टाफ और डॉक्टर को बुलाकर लगा दिया और फिर वह चले गए। सरकार व व्यवस्था अगर चाहेगी तभी सब सही हो पायेगा। अब तो डॉक्टर और स्टाफ भी दहशत में है कि वह कैसे आधे-अधूरे इंतजाम के साथ सबकुछ ठीक रखे। एक जानकार बताते हैं कि मेडिकल कॉलेज में क्या कमी है, व्यवस्था कैसे सुधरेगी इसके लिए आईएएस और मंत्री बैठक करते हैं। कोरम के लिए प्रिंसिपल को बुलाया जाता है। पर सवाल है कि ये कौन से विशेषज्ञ हैं जो रणनीति बना लेंगे। इसके बाद आदेश जारी हो जाता है बिना किसी विशेषज्ञ की बात सुने।
एसआईसी रमाशंकर शुक्ला बोले ये सामान्य बात है
एनआईसीयू में हो रही मौतों पर बीआरडी मेडिकल कॉलेज से संबद्ध नेहरू चिकित्सालय के प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक डॉ.रमाशंकर शुक्ला कहते हैं कि सामान्य तौर पर हर 1000 बच्चों में एक साल पूरा करते-करते करीब 120 की मौत हो जाती है। मेडिकल कॉलेज में जो नवजात आते हैं वह बेहद क्रिटिकल स्थिति में होते हैं। ये आंकड़ा सामान्य बात है। अब कोई गंभीर होता है तो सीधे मेडिकल कॉलेज भागता है इसलिए अस्पतालों में मौतों की संख्या बढ़ रही। वह कहते हैं कि नियोनेटल आईसीयू में कहीं कोई कमी नहीं है। वह संक्रमण की बात से भी इंकार करते हैं।
| महीना | मौतें |
| जनवरी | 147 |
| फरवरी | 117 |
| मार्च | 141 |
| अप्रैल | 114 |
| मई | 127 |
| जून | 125 |
| जुलाई | 95 |
| अगस्त | 223 |
Updated on:
30 Aug 2017 08:33 pm
Published on:
30 Aug 2017 07:38 pm
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