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PM का ड्रीम प्रोजेक्ट, ‘विश्वनाथ कॉरिडोर’ फिर फंसा पचड़े में, अबकी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना का आरोप

पांचवा गेट खोलने और उससे जुड़े भवनों को गिराने पर सामने आया दूसरा पक्ष

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विश्वनाथ मंदिर ज्ञानवापी मस्जिद

विश्वनाथ मंदिर ज्ञानवापी मस्जिद

वाराणसी. प्रधानमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट विश्वनाथ कॉरिडोर फिर से कानूनी पचड़े में फंस गया है। इस दफा विश्वनाथ मंदिर व जिला प्रशासन सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनदेखी का आरोप लगा है। संबंधित पक्ष ने साफ-साफ चेतावनी दी है कि अगर मंदिर व जिला प्रशासन ने कार्रवाई न रोकी तो दोबारा सुप्रीम कोर्ट जाने को विवश होंगे, तब सर्वोच्च न्यायालय की अवहेलना का मामला बनेगा।

इस दफा विश्वनाथ मंदिर परिक्षेत्र के व्यवसायी का क्षेत्रीय नागरिक नहीं बल्कि मंदिर से जुड़े ज्ञानवापी मस्जिद की देखरेख करने वाली अंजुमन इंतजामिया मसाजिद सामने आ गई है। इस कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट के करीब 25 साल पुराने एक आदेश को सामने रख कर अपना प्रतिवाद जाहिर किया है। ज्ञानवापी मस्जिद की देखरेख करने वाली कमेटी अंजुमन इंतजामिया मसाजिद ने कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा है कि प्रशासन सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना कर रहा है। उनकी नहीं सुनी गई तो वे फिर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे।

बता दें कि ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर स्‍थानीय से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कई मुकदमे चले हैं। अयोध्‍या प्रकरण के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश से काशी विश्‍वनाथ मंदिर समेत पूरे ज्ञानवापी परिसर की सुरक्षा केंद्रीय एजेंसियों को सौप दी गईं। इधर बीच इसी इलाके में वाराणसी के सांसद व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रॉजेक्‍ट विश्‍वनाथ कॉरिडोर का काम चल रहा है। मंदिर विस्‍तार व कॉरिडोर के नाम पर खरीदे गए भवनों के ध्‍वस्‍तीकरण के दौरान ज्ञानवापी मस्जिद के पीछे के हिस्‍से की तरफ मंदिर का नया प्रवेश द्वार सामने आया है। मंदिर प्रशासन का कहना है कि इसे पांचवे द्वार के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा।

मंदिर प्रशासन का तर्क है कि करीब 200 साल बाद सामने आए नए प्रवेश द्वार के उपयोग से श्रद्धालुओं को काफी राहत होगी। दूसरी ओर अंजुमन इंतजामिया मसाजिद ने मस्जिद के पास की जा रही तोड़फोड़ को सुप्रीम कोर्ट के 1992 से लेकर 1997 तक में दिए गए फैसलों का खुला उल्‍लंघन करार देते हुए इसे मस्जिद-मंदिर, दोनों के लिए खतरा बताया है। हालांकि नया विवाद सामने आने के बाद से तोड़फोड़ रोक दी गई है। लेकिन मंदिर या जिला प्रशासन का कोई अधिकारी इस बारे में बोलने को तैयार नहीं है।

अंजुमन इंतजामिया मसाजिद के ज्वाइंट सेक्रेटरी एसएम यासीन का कहना है कि मो. असलम उर्फ घूरे की ओर से दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने यथा स्थिति बनाए रखने के साथ पुख्‍ता सुरक्षा के इंतजाम करने के आदेश दिए हैं। फैसले में यह भी कहा गया है कि इस बारे में किसी तरह की भ्रम की स्थिति या फिर दिशा-निर्देश को लेकर संबंधित पक्ष के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खुला रहेगा। उनका कहना है कि वाराणसी की स्‍थानीय कोर्ट में ब्रिटिश हुकूमत के दौर में चले सिविल सूट में फैसला ज्ञानवापी मस्जिद के पक्ष में था। इसके बाद 1954 में हुए त्रिपक्षीय समझौते में इस बात का साफ जिक्र है कि ज्ञानवापी कैंपस में कोई भी निर्माण या नया काम पक्षों की सहमति के बगैर नहीं हो सकेगा। यह समझौता तत्‍कालीन सिटी मजिस्‍ट्रेट गौरी शंकर सिंह, अंजुमन इंतजामिया मसाजिद और हिन्‍दू पक्ष की ओर से व्‍यास पीठ के बीच हुआ था। 1993 में तत्‍कालीन डीएम की ओर से जारी गाइड लाइन में मंदिर के प्रवेश द्वारों का भी स्‍पष्‍ट उल्‍लेख है। अंजुमन इंतजामिया का आरोप है कि वर्तमान प्रशासन इन सभी तथ्‍यों को दरकिनार कर मनमानी कर रहा है।