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BHU के वेज्ञानिकों की बड़ी खोजः खोजी नील हरित शैवाल की नई प्रजाति ‘Cyanobacteria’, जैवविविधता के संरक्षण को मिलेगा नया आयाम

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के वैज्ञानिकों ने बड़ी खोज की है। ये खोज भारत में जैवविविधता के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण साबित होगी। खास ये कि पूर्वोत्तर क्षेत्र से इस तरह की यह पहली खोज है। विश्विद्यालय के वैज्ञानिकों ने पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा में की सायनोबैक्टीरिया (नील हरित शैवाल) के नए जीनस की पहचान की है। तो जानते हैं क्या है सायनोबैक्टीरिया और क्या हैं इस खोज के फायदे...

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BHU, Scientists

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वाराणसी. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के वेज्ञानिकों का कोई शान ही नहीं। हर क्षेत्र में नित नए-नए शोध कर न केवल इंसानों की गंभीर से गंभीर बामारियों के इलाज कि दिशा में काम कर एक मिशाल कायम की है। वहीं सामाजिक सरोकारों से जुड़े अनेक शोध किए हैं और कई शोध जारी हैं। इसी कड़ी में अब विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान के वैज्ञानिकों ने वो काम किया है जिस पर दुनिया भर में शोध चल रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जब तक जैव विविधता की पहचान और संरक्षण के लिए समर्पित प्रयास नहीं किए जाते तब तक मानव जाति के समक्ष ऐसी स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है, जहां जीवों के कई प्रकार गुमनामी में ही हमेशा के लिए विलुप्त हो सकते हैं। उन्हीं में से एक है सायनोबैक्टीरिया (नील हरित शैवाल)। ये तकरीबन उन सभी पारिस्थितिक तंत्रों के महत्वपूर्ण घटक हैं जहाँ जीवन की कल्पना की जा सकती है। आसान शब्दों में कहें तो सायनोबैक्टीरिया वे जीव हैं जो पृथ्वी के ऑक्सीजनिकरण के लिए जिम्मेदार हैं। सायनोबैक्टीरिया और उनके विविध रूपों के बारे में अधिक जानकारी जुटाने के लिए वैश्विक स्तर पर गहन अध्ययन चल रहे हैं।

त्रिपुरा से सायनोबैक्टीरिया के एक नए जीनस की पहचान की

ऐसे में Taxonomy के क्षेत्र में एक बड़ी विशेष सफलता अर्जित करते हुए बीएचयू के वैज्ञानिकों ने पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा से सायनोबैक्टीरिया के एक नए जीनस की न केवल पहचान की अपितु उसके बारे में सारी जानकारी एकत्र की है। बीएचयू के वनस्पति विज्ञान विभाग के शोधकर्ताओं का ये अध्ययन ये खोज आधुनिक पॉलीफेसिक दृष्टिकोण (Polyphasic approach) का उपयोग पर आधारित है। सायनोबैक्टीरिया या अन्य जीवों की पहचान करने में पॉलीफैसिक दृष्टिकोण अन्य दृष्टिकोणों (approaches) की तुलना में अधिक सटीक और विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण है।

त्रिपुरा निवासी सागरिका ने 2020 में शुरू किया ये अध्ययन

ये अध्ययन, त्रिपुरा की मूल निवासी सागरिका पाल ने 2020 में शुरू किया था। सागरिका बीएचयू के वनस्पति विज्ञान विभाग में सहायक प्रोफेसर डॉ प्रशांत सिंह के निर्देशन में पीएचडी कर रही हैं।

इस नए जीनस का नाम ‘त्रिपुरेंसिस’ त्रिपुरा राज्य में पाए जाने के कारण दिया गया नाम

जॉन कैरोल विश्वविद्यालय, अमेरिका ख्यात फाइकोलॉजिस्ट प्रो. जेफरी आर जोहानसन के सम्मान में इस नए जीनस का नाम ‘जोहानसेनिएला’ रखा गया है, जबकि प्रजाति का नाम ‘त्रिपुरेंसिस’, त्रिपुरा राज्य की वजह से दिया गया है, जहां इस शैवाल के नमूने लिए गए थे।

नए सायनोबैक्टीरियल जीनस की ये है पहली रिपोर्ट

भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट के रूप में जाना जाता है और दुर्लभ वनस्पतियों और जीवों के भण्डार के रूप में प्रख्यात है। पूर्वोत्तर क्षेत्र में जैव विविधता के विभिन्न रूपों पर कई टैक्सोनॉमिक अध्ययन किए जाने के बावजूद, आधुनिक दृष्टिकोणों (modern approaches) का उपयोग करते हुए चुनिंदा सायनोबैक्टीरियल टैक्सोनॉमिक अध्ययन ही हुए हैं। ख़ास यह है कि जोहानसेनिएला त्रिपुरेंसिस इस क्षेत्र से खोजे गए एक नए सायनोबैक्टीरियल जीनस की पहली रिपोर्ट है, जो भारत में इस तरह के जेनेरा के गिनेचुने निष्कर्षों में से एक है। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इस वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट में बड़ी संख्या में ऐसे सायनोबैक्टीरिया हो सकते हैं, जिनके बारे में अब तक कुछ भी जानकारी नहीं। ऐसे में यह अध्ययन शोधकर्ताओं को सायनोबैक्टीरिया की खोज, पहचान और संरक्षण में मदद करने के लिए प्रेरित करने का काम करेगा।

शोध माइक्रोबायोलॉजी लेटर्स में प्रकाशित

इस शोध को साइंस एंड टेक्नॉलजी रिसर्च बोर्ड, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, (DST-SERB), भारत सरकार की कोर रिसर्च ग्रांट और बीएचयू इंस्टीट्यूशन ऑफ एमिनेंस (IoE) स्कीम के तहत मिले अनुसंधान अनुदान द्वारा वित्त पोषित किया गया था। यह अध्ययन वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित शोध पत्रिका FEMS माइक्रोबायोलॉजी लेटर्स में प्रकाशित हुआ है।

इस शोध में ये भी रहे शामिल

पिछले कुछ वर्षों में डॉ. प्रशांत सिंह के शोध समूह ने दुनिया के विभिन्न हिस्सों से सायनोबैक्टीरिया की कई नई प्रजातियों का वर्णन किया है। शोध समूह का उद्देश्य अधिक शोधकर्ताओं को जैव विविधता के संरक्षण की दिशा में काम करने के लिए प्रोत्साहित करना है। शोध दल में अनिकेत सराफ (आरजे कॉलेज, मुंबई), नरेश कुमार (पीएचडी छात्र, बीएचयू) और आरुष सिंह, उत्कर्ष तालुकदार और नीरज कोहर (एमएससी, वनस्पति विज्ञान, बीएचयू) भी शामिल थे।