
छात्र से बाहुबली बनने का सफर
वाराणसी: पूर्वांचल में एक समय में यहां एक परिवार ऐसा भी था जहां सुबह की शुरुआत चाय के साथ देशभक्ति की बातों से हुआ करती थी। गाजीपुर के मोहम्मदाबाद इलाके में इस परिवार की काफी चर्चा थी। यह परिवार था पूर्वांचल और यूपी में अपने बाहुबल से धमक रखने वाले मुख्तार अंसारी का। कभी ऐसा समय था कि मुख्तार के दादा की तस्वीर महात्मा गांधी के साथ दीवारों पर लटका हुआ करती थी और नाना ब्रिगेडियर उस्मान की बहादुरी के किस लोग के जहन में बैठे हुए थे। इसी परिवार में एक बालक का जन्म हुआ और बाद में चल कर वह बाहुबली बन गया। एक समय ऐसा भी आया कि उसने खादी तो पहनी, लेकिन वह खून के रंग में रंगी हुई थी।
पूर्वांचल और उत्तर प्रदेश में बाहुबली बनकर उभरा मुख्तार अंसारी का परिवार राजनीति में सक्रिय रहा, लेकिन फिर भी वह डॉन बनने की चाहत रखता था। बताया जाता है कि मुख्तार अंसारी के दादा डॉक्टर मुख्तार अहमद अंसारी एक स्वतंत्रता सेनानी थे और उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के साथ भी काम किया और देश को आजादी दिलाने में मदद की। फिर भी उनका पोता मुख्तार बाहुबली के नाम से जाना जाता था।
गाजीपुर के मोहम्मदाबाद के रहने वाले सुबहानउल्लाह और बेगम राबिया को 3 जून 1963 को एक बेटा हुआ, जिसका नाम उन्होंने मुख्तार अंसारी रखा। छोटे से गांव में रहने वाले इस परिवार ने स्वतंत्रता संग्राम के बाद राजनीति में सक्रिय रूप से अपना योगदान दे रहा था। बताया जाता है कि मुख्तार अंसारी के दादा डॉक्टर मुख्तार अहमद अंसारी एक स्वतंत्रता सेनानी थे। यही नहीं पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी मुख्तार के रिश्ते के चाचा थे, लेकिन फिर भी मुख्तार अंसारी एक बाहुबली के रूप में प्रदेश की अपराध की दुनिया में उभरा।
यूपी के पूर्व डीजीपी बृजलाल की किताब 'डेढ़ बिस्वा जमीन' के मुताबिक, मुख्तार अंसारी क्रिकेट खेलने का शौक रखता था और वह क्रिकेटर बनना चाहता था, लेकिन अपने कॉलेज की जिंदगी में वह साधू सिंह के संपर्क में आया और उसकी गैंग में शामिल हो गया। धीरे-धीरे उसके कदम जरयम की दुनिया की तरफ बढ़ने लगे और उसका वापस लौटना लगभग नामुमकिन सा हो गया। मुख्तार के नाना ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान 1947 की लड़ाई में शहीद हुए थे और उन्हें महावीर चक्र दिया गया था, लेकिन जिस तरह से मुख्तार ने बाहुबली बनने की ठानी, उसके बाद मुख्तार से लोग धीरे-धीरे कांपने लगे। हालांकि, गाजीपुर में उसकी छवि रॉबिन हुड के रूप में थी।
बताया जाता है किस 1978 में गाजीपुर के सैदपुर थाने में एक धमकी देने का मामला दर्ज किया गया और आरोपी मुख्तार अंसारी पर लगा। बताया जाता है कि उस समय मुख्तार की उम्र केवल 15 साल की थी और इसके बाद मुख्तार का सफर उसी रास्ते पर शुरू हुआ, जिससे लौटना नामुमकिन हो गया। ठीक एक दशक बाद 1986 में मोहम्मदाबाद थाने में मुख्तार के खिलाफ एक संगीन धारा में मुकदमा दर्ज हुआ, जिसमें हत्या किए जाने का आरोप मुख्तार पर लगा। इसके अगले दशक में मुख्तार पर एक दो नहीं बल्कि 14 मुकदमे दर्ज किए गए और आरोप भी हत्या, लूट वा रंगदारी जैसे गंभीर थे।
मुख्तार अंसारी के आपराधिक गुरु कहे जाने वाले साधु और माखनु सिंह के इशारे पर 80 के दशक में उसने रणजीत सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी। इसके बाद मुख्तार ने विभिन्न विभागों में टेंडर लेने की ठानी और कोयला खनन, रेलवे निर्माण जैसे कई टेंडर को उसने अपने बाहुबल के दम पर हासिल कर लिया। हालांकि, इस दौरान वह गाजीपुर के लोगों के लिए मसीहा के रूप में भी उभरा। बताया जाता है कि मुख्तार गरीब लोगों की मदद भी किया करता था। यही वजह थी कि गाजीपुर और आसपास के जिलों के लोगों के लिए उसकी छवि रॉबिन हुड जैसी बन गई।
बताया जाता है कि मुख्तार अंसारी मुसलमान होते हुए भी सभी धर्म के लोगों की मदद किया करता था और इस बात की पुष्टि उसके परिवार के लोग भी कर चुके हैं। यदि कोई गरीब मुख्तार के दरवाजे पर पहुंचता था तो वह उसे खाली हाथ नहीं लौट देता था। बेटी की शादी हो, इलाज के लिए पैसे की जरूरत हो या प्रशासनिक मदद की जरूरत हो, मुख्तार अंसारी ऐसे लोगों की सभी इच्छाएं पूरी किया करता था। इसी कारण से धीरे-धीरे गाजीपुर और आसपास के जिलों के लोगों के दिल में उसने एक अलग छवि बना ली।
90 के दशक में मुख्तार अंसारी का पूर्वांचल में दबदबा हो चुका था। उसके पास सरकारी टेंडर और अपराध की दुनिया का बाहुबल था। इसके बाद उसने राजनीति में उतरने की इच्छा जाहिर की। 1995 में गाजीपुर के सदर विधानसभा सीट पर मुख्तार अंसारी ने कम्युनिस्ट पार्टी के सिंबल पर चुनाव लड़ा, लेकिन उसे सफलता हासिल नहीं हुई। इसके बाद 1996 में उसने बीएसपी के टिकट पर मऊ विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत गया। इसके बाद मुख्तार अंसारी की राजनीति में एंट्री हुई।
Updated on:
11 Apr 2026 06:33 pm
Published on:
11 Apr 2026 01:04 pm
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