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एक माफिया की कहानी जो करना चाहता था सीएम की हत्या

पांच साल में ही ताबड़तोड़ वारदात को अंजाम देकर बन गया था नम्बर वन बदमाश, फिल्मी जीवन की तरह है इस डॉन की पटकथा

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Devesh Singh

Jul 04, 2016

Mafiya

Mafiya

वाराणसी. अपराधियों के सुपारी लेकर हत्या करने की खबरे अक्सर आती है लेकिन एक माफिया ऐसा था, जिसने सीएम तक को मारने की सुपारी ले ली थी। मात्र पांच साल के अंदर वह ताबड़तोड़ वारदात करके नम्बर वन बदमाश बन गया था। पुलिस भी इस माफिया से खौंफ खाती थी और इस माफिया को पकडऩे के लिए ही एसटीएफ का जन्म। जिसे भी माफिया को अंजाम तक पहुंचाने के लिए नाको चने चबाने पड़े थे।
हम बात कह रहे है कि यूपी में 90 दशक के सबसे बड़े बदमाश श्रीप्रकाश शुक्ला की। आम पहलवान से बदमाश बनने की कहानी किसी हिन्दी फिल्म से कम नहीं है। श्रीप्रकाश शुक्ला को जिगरवाला बदमाश माना जाता था यदि श्रीप्रकाश शुक्ला का वर्चस्व कायम रहता तो शायद यूपी में और किसी माफिया का जन्म नहीं हो पाता।
Shri Prakash Shukla


गोरखपुर के ममखोर गांव में श्रीप्रकाश शुक्ला का जन्म हुआ था। श्रीप्रकाश शुक्ला के पिता अध्यापक थे और श्रीप्रकाश पहलवानी करते था और जब वह 20 साल का हुआ तो गांव के ही राकेश तिवारी नामक व्यक्ति ने उसकी बहन को देख कर सीटी बजा दी थी इसी बात से नाराज होकर श्रीप्रकाश ने राकेश की हत्या कर दी। इसके बाद श्रीप्रकाश शुक्ला ने जयराम की दुनिया में कदम रखा तो पीछे मुडकर नहीं देखा। हत्या के मामले में जब श्रीप्रकाश को पुलिस तलाश रही थी तो वह किसी तरह बैंकाक भाग गया। वहां पर कुछ दिन ठहरने के बाद जब श्रीप्रकाश के पैसे खत्म हो गये तो वह वापस भारत आया। जिस प्रकार अपरहण फिल्म में अभिनेता अजय देवगन को नाना पाटेकर का साथ मिलता है और वह क्राइम का बेताज बादशाह बन जाता है उसी प्रकार श्रीप्रकाश सीधे बिहार के मोकामा में पहुंचा और सूरजभान गैंग में शामिल हो गया। इसके बाद श्रीप्रकाश शुक्ला जयराम की दुनिया में तेजी से उभरता हुआ नाम बन गया। हत्या, किडनैप, रंगदारी सरकारी ठेकों पर सिर्फ और सिर्फ श्रीप्रकाश का कब्जा होता गया।

1997 में की थी बाहुबली राजनेता की हत्या
श्रीप्रकाश शुक्ला के रास्ते जो भी आया उसे हटा दिया गया। 1997 में लखनऊ में बाहुबली राजनेता वीरेन्द्र शाही की श्रीप्रकाश शुक्ला ने हत्या कर दी। इसके बाद तो यूपी में श्रीप्रकाश शुक्ला का आतंक कायम हो गया।

13 जून का दिया सबसे बड़े वारदात को अंजाम
श्रीप्रकाश शुक्ला के मन में किसी का खौफ नहीं था इसका प्रमाण बिहार के मंत्री हत्याकांड से मिला। श्रीप्रकाश शुक्ला ने 13 जून 1998 को पटना स्थित इंदिरा गांधी हॉस्पिटल के बाहर बिहार सरकार के मंत्री बृज बिहारी प्रसाद को उनके सुरक्षाकर्मियों के सामने ही गोलियों से भून दिया था। श्रीप्रकाश अपने तीन साथियों के साथ लाल बत्ती कार में आया था और हत्याकांड में एके-47 का प्रयोग किया गया था।

सीएम को मारने के लिए ली सुपारी
यूपी पुलिस जब श्रीप्रकाश शुक्ला को जिंदा या मुर्दा पकडऩे में नाकाम रही थी तो उसे पकडऩे के लिए 4 मई 1998 को तत्कालीन एडीजी अजय राय शर्मा ने स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) का गठन किया था। उसे समय यूपी पुलिस के तेज तर्रार 50 सिपाहियों को एसटीफ में शामिल किया गया था। एसटीएफ ने बड़ी मेहनत करके श्रीप्रकाश शुक्ला की फोटो उपलब्ध करायी थी, जिससे पता चला था कि यह यूपी का नम्बर वन बदमाश देखने में कैसा है। श्रीप्रकाश शुक्ला ने तत्कालीन सीएम कल्याण सिंह को मारने के लिए 6 करोड़ की सुपारी ली थी इस बात की जानकारी होने पर एसटीएफ का एक ही उद्देश्य था श्रीप्रकाश शुक्ला को पकडऩा या फिर मारना।

पहली मुठभेड़ हुई थी नाकाम
पुलिस के साथ श्रीप्रकाश शुक्ला की पहली मुठभेड़ 9 सितम्बर 1997 को लखनऊ के जनपथ मार्केट में हुई थी इस मुठभेड़ में श्रीप्रकाश शुक्ला पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ पाया था। पुलिस का एक सिपाही भी शहीद हो गया था इसके बाद से यूपी के जयराम दुनिया में श्रीप्रकाश का आतंक छा गया था।

प्रेमिका से करता था बात और फिर.....
श्रीप्रकाश शुक्ला की एक प्रेमिका थी जो दिल्ली में रहती थी श्रीप्रकाश शुक्ला उससे बात करता था। एसटीएफ को इस बात की जानकारी हो गयी थी और उसने प्रेमिका को मोबाइल नम्बर सर्विलांस पर लगाया था। इस बात की जानकारी भी श्रीप्रकाश को हो गयी थी लेकिन प्रेमिका से बात करने के लालच में वह पीसीओ से फोन करता था। एसटीएफ को उसकी लोकेशन मिल गयी थी और 23 सितम्बर 1998 को सर्विलांस के आधार पर एसटीएफ ने श्रीप्रकाश शुक्ला को घेर लिया और समर्पण करने को कहा। श्रीप्रकाश शुक्ला ने फायरिंग शुरू कर दी और मुठभेड़ में वह मारा गया।

पुलिस का सबसे महंगा अभियान था श्रीप्रकाश शुक्ला
श्रीप्रकाश शुक्ला भले ही मारा गया था लेकिन पुसिल ने उसके पकडऩे के अभियान पर करोड़ों रुपये खर्च किये थे। उस समय सर्विलांस करना बहुत महं्रगा था और श्रीप्रकाश शुक्ला की तलाश में एसटीएफ ने मुम्बई, राजस्थान, बिहार, मध्यप्रदेश, दिल्ली आदि राज्यों को छाना था मुखबिरों पर भी एसटीएफ ने पानी की तरह पैसा बहाया था। श्रीप्रकाश शुक्ला की मौत के बाद उसका खौफ भले खत्म हो गया था लेकिन जयराम की दुनिया में उसके आज भी चर्चे होते हैं।

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