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बुंदेलखंड के लिए राजा बुंदेला की प्रतिज्ञा, चावल-चपाती-चीनी और चारपाई का किया त्याग

#PatrikaKeynoteVaranasi में भाग लेने पहुंचे पिछले 20 साल से अलग बुंदेलखंड राज्‍य की लड़ाई लड़ रहे फिल्‍म अभिनेता राजा बुदेला ने खुलकर बात की।

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Raja Bundela statement for Bundelkhand separate state in Patrika Keynote Varanasi UP India News

बुंदेलखंड के लिए राजा बुंदेला की प्रतिज्ञा, चावल-चपाती-चीनी और चारपाई का किया त्याग

वाराणसी. बदहाली, भुखमरी और बेरोजगारी के शिकार बुंदेलखंड को यूपी से अलग कर नया राज्‍य बनाकर समृद्धि की राह पर ले जाने के लिए पिछले बीस साल से संघर्ष कर रहे फिल्‍म अभिनेता राजा बुंदेला ने महाभारत के भीष्‍म की तरह ही एक प्रतिज्ञा ली है। जब तक बुंदेलखंड अलग राज्‍य नहीं बनेगा तब तक वे चावल, चपाती, चीनी और चारपाई का इस्‍तेमाल नहीं करेंगे। बुंदेला की इस प्रतिज्ञा से पर्दा शुक्रवार को उस समय उठा जब वे पत्रिका द्वारा आयोजित की-नोट में भाग लेने वाराणसी पहुंचे। यहां भी बुंदेला फाइव स्‍टार होटल की सुविधाओं को छोड़कर जमीन पर सोए। जब उनसे इस बारे में पूछा गया तो उन्‍होंने बताया कि आठ साल पहले जब उनकी मुलाकता अपने गुरू से हुई तो उन्‍होंने कहा कि बिना त्‍याग के कुछ हासिल नहीं होता। आखिर तुमने क्‍या त्‍याग किया है क्‍या तुम चावल, चपाती, चीनी और चारपाई का त्‍याग कर सकते हो।

बुंदेलखंड के लिए किया त्याग
उसी समय उन्‍होंने संकल्‍प लिया और तय किया कि जब तक बुंदेलखंड राज्‍य की स्‍थापना नहीं होती तब तक वे चावल चपाती, चीनी और चारपाई को हाथ भी नहीं लगाएंगे। आज तक वे इस प्रतिज्ञा को निभा रहे हैं, आगे भी यह जारी रहेगा।
राजा बुंदेला की इस भीष्‍म प्रतिज्ञा से बुंदेलखंड अलग राज्‍य बनेगा या नहीं, यह तो आने वाला समय बताएगा। लेकिन यह तय है कि उनका यह त्‍याग बुंदेलखंड की आने वाली पीढ़ी के लिए एक मिसाल जरूर बनेगा। कारण कि बुंदेला ने अलग राज्‍य के सपने को साकार करने के लिए अपना अभिनय तक त्‍याग दिया है। आज वे फिल्‍म निमार्ण भी करते हैं तो कहीं न कहीं उसका केंद्र बुंदेलखंड ही होता है।

बुंदेलखंड के हक के लिए बनाई कई फिल्में

लोगों में जागरूकता पैदा करने और बुंदेलखंड के लोगों को रोजगार से जोड़ने के साथ ही अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए प्रथा, मुझे चांद चाहिए, किसने भरमाया मेरे लखन को, राजपथ, दिल ही दिल में आदि फिल्‍मों का निर्माण कर चुके हैं। आगामी दिसंबर माह में उनकी एक और फिल्‍म एलेक्‍स हिंदुस्‍तानी भी रिलीज होने के लिए तैयार है, जो बुंदलेखंड की सत्‍य घटना पर आधारित है। बुंदेला का मानना है कि आज नहीं तो कल लोगों में जागरूकता आएगी, वे अपने अधिकार को समझेंगे। साथ ही उन्‍हें भरोसा है कि सरकार भी चेतेगी और अलग राज्‍य का गठन कर बुंदेलखंड को विकास के पथ पर अग्रसर करेगी। फिर उन्‍हें चावल, चपाती, चीनी, चारपाई के प्रयोग का अवसर प्राप्‍त होगा।

पत्रिका से खास बातचीत

कभी यूपी का सबसे समृद्ध क्षेत्र माना जाने वाला बुंदेलखंड आज बदहाली का शिकार क्‍यों है? आखिर वहां बेकारी, भुखमरी, पलायन की समस्‍या दिन प्रतिदिन क्‍यों बढ़ रही है? इन समस्‍याओं के समाधान के लिए पिछले 70 सालों में सरकार ने क्‍या प्रयास किये और वे कितने सार्थक रहे? बुंदेलखंड को अलग राज्‍य बनाने की जरूरत क्‍यों है? पत्रिका की-नोट में भाग लेने वाराणसी पहुंचे पिछले 20 साल से अलग बुंदेलखंड राज्‍य की लड़ाई लड़ रहे फिल्‍म अभिनेता राजा बुदेला ने खुलकर बात की। आगे पढ़िए पत्रिका से उनकी बातचीत का कुछ अंश...


प्रश्‍न: बुंदेलखंड की बदहाली के लिए जिम्‍मेदार किसे मानते हैं?
उत्‍तर: बुंदेलखंड की बदहाली के पीछे सबसे बड़ा कारण जातीय समीकरण, चुनावी वादों का पूरा न होना, राजनीतिक जुमलेबाजी, अशिक्षा, बेरोजगारी और अस्थिरता, अविश्‍वास, सरकारी योजनाओं का समय से क्रियान्‍वयन न होना है। साथ ही यूपी का बड़ा क्षेत्रफल होना भी इसके विकास में बाधक है। यहां 53 प्रतिशत लोग अशिक्षित हैं। 67 प्रतिशत लोग रोजी रोटी के लिए पलायन करते हैं और 48 प्रतिशत लोग भुखमरी के शिकार हैं।


प्रश्‍न: बुंदेलखंड को कैसे बदला जा सकता है?
उत्‍तर: विकास के लिए जरूरी है कि राज्‍य छोटे हों। जब देश आजाद हुआ, उस समय छोटी-बड़ी पांच सौ से अधिक रियासतों का विलय कर राज्‍यों का गठन किया गया। जबकि उनका आपस में कोई मेल नहीं था। जैसे महाराष्‍ट्र और गुजरात, बिहार और छत्‍तीसगढ़, उत्‍तर प्रदेश और उत्‍तराखंड। जब तक ये एक थे गुजरात, छत्‍तीसगढ़, उत्‍तराखंड में बुंदेलखंड जैसे हालात थे। लेकिन अलग राज्‍य बनने के बाद उन्‍होंने तेजी से विकास किया। बुंदेलखंड का विकास करना है तो अलग राज्‍य बनाना होगा।


प्रश्‍न: क्‍या बिना बटवारे के विकास संभव नहीं है? बुंदेलखंड अलग होने के बाद पूर्वांचल की भी तो मांग उठेगी?
उत्‍तर: विकास का प्रयास तो पिछले 70 सालों से हो रहा है। लेकिन परिणाम क्‍या है। भुखमरी, बेकारी, पलायन। अगर यह छोटा राज्‍य होता तो यहां का कोई सीएम होता। जो यहां की जरूरतों को समझता। उस हिसाब से काम करता। रहा सवाल पूर्वांचल राज्‍य का तो वह वहां की जरूरत और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। अगर वहां के लोगों को लगाता है कि ऐसा करने से वहां की तस्‍वीर बदल सकती है तो निश्चित तौर पर इसकी मांग उठेगी और उठनी भी चाहिए।

प्रश्‍न: 2014 के लोकसभा में मोदी जी ने बुंदेलखंड की बदहाली का मुद्दा उठाया था और 2017 के चुनाव में भी यह बड़ामुद्दा बना। अब केंद्र और राज्‍य में बीजेपी की सरकार है, क्‍या विकास की गति बढ़ी है?

उत्‍तर: वर्ष 2014 में बीजेपी को बुंदेलखंड की सभी 19 सीटों पर विजय इसीलिए मिली क्योंकि वहां की जनता ने मोदी पर भरोसा जताया था। वही भरोसा आज योगी पर है। योगी जी प्रयास भी कर रहे हैं। लेकिन राज्‍य बड़ा होने के कारण एक क्षेत्र पर ध्‍यान केंद्रित करना संभव नहीं है। वहीं यहां का जातीय समीकरण और धार्मिक समीकरण भी कहीं न कहीं विकास में बांधक बन रहा है। बुंदेला 2019 का चुनाव बीजेपी के लिए काफी कठिन मानते हैं, इसकी वजह वे जा‍तीय और धार्मिक समीकरण को बताते हैं।


प्रश्‍न: बुंदेलखंड विकास बोर्ड के गठन का कितना लाभा मिला?
उत्‍तर: योगी जी और मोदी जी अपने स्‍तर पर प्रयास कर रहे हैं। आने वाले समय में इसका असर दिखेगा लेकिन मैं एक बार फिर कहुंगा कि संपूर्ण विकास और समृद्धि के लिए अलग राज्‍य का बनना जरूरी है। साथ ही मैं चाहता हूं कि बोर्ड में आम आदमी, डॉक्‍टर, इंजीनियर, पत्रकार, समाजसेवी आदि को शामिल किया जाए और उनकी राय लेकर वहां की जरूरत के मुताबिक विकास के प्‍लान तैयार किये जाएं।


प्रश्‍न: अलग राज्‍य के गठन के लिए आपके द्वारा चलाया जा रहा आंदोलन किस चरण में है और आगे की क्‍या रणनीति है?
उत्‍तर: संघर्ष तो मैं बीस साल से कर रहा हूं। मैंने इसके लिए अभियन भी छेड़ दिया। बात आगे बढ़ी है, लेकिन अभी हमें कामयाबी नहीं मिली है। हमारा यह आंदोलन वैचारिक आंदोलन है। हम उग्र आंदोलन में विश्‍वास नहीं रखते। देश की संपत्ति को क्षति पहुंचाना या फिर सड़कों पर उतर कर व्‍यवस्‍था को छिन्‍न-भिन्‍न करना हमारे आंदोलन का हिस्‍सा नहीं। हम लोगों को उनके हक के प्रति जागरूक कर व सरकार को अपनी जरूरत को समझाकर अपना उद्देश्‍य पूरा करने का प्रयास कर रहे हैं। हमे उम्‍मीद है कि कामयाबी जरूर मिलेगी। फिल्‍मी हस्तियां और मीडिया भी इस आंदोलन में हमारे साथ है। अगर ऐसा न होता तो आज मुझे इस मुद्दे पर बात करने के लिए पत्रिका आमंत्रित नहीं करता।

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