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मंदिर केवल पूजा नहीं मोक्ष और चित्त सिद्धि का स्थल, सत्य को प्राप्त करने की जगह है : मोहन भागवत

Varanasi News : वाराणसी में आयोजियत इस महासम्मेलन में मोहन भागवत ने कहा कि मंदिर पवित्रता के आधार हैं। उनकी स्वच्छता का ध्यान रखना चाहिए। गुरुद्वारा जाना है तो पानी में होकर जाना होता है। लेकिन, ऐसा सभी मंदिरों में नहीं है। ऐसी ही स्वच्छता का ध्यान रखना है। ये सब मंदिरों में होना चाहिए।

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Mohan Bhagwat

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Varanasi News : वाराणसी में शनिवार को मंदिरों की संस्कृति के आदान प्रदान के लिए 30 देशों के 1600 प्रतिनिधियों का टेंपल महासम्मेलन शुरू हुआ। इसका उद्घाटन संघ प्रमुख मोहन भागवत ने किया। उन्होंने कहा कि 'मंदिर केवल पूजा नहीं मोक्ष और चित्त सिद्धि का स्थल है। सत्य को प्राप्त करना, अपना आनंद सबका आनंद हो, इसके लिए धर्म ही समाज को तैयार करता है।' उन्होएँ यह भी कहा कि 'समय आ गया है, अब देश और संस्कृति के लिए त्याग करें।'

देश और संस्कृति के लिए त्याग करने का समय आ गया है

मोहन भागवत ने सम्मेलन में आये संतों, मठ मंदिरों के कार्यपालक अधिकारीयों को, महामंडलेश्वरों और अनुयायियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि हम सभी को अपने आस-पास की गलियों के छोटे-छोटे मंदिरों की सूची बनानी चाहिए। वहां रोज पूजा हो, सफाई रखी जाए। मिलकर सभी आयोजन करें। संगठित बल साधनों से संपूर्ण करें।' उन्होएँ आगे कहा कि 'मंदिरों को अपना-उनका छोड़कर एक साथ आगे आएं। जिसको धर्म का पालन करना है वो धर्म के लिए सजग रहेगा। निष्ठा और श्रद्धा को जागृत करना है। छोटे स्थान पर छोटे से छोटे मंदिर को समृद्ध बनाना है। समय आ गया है, अब देश और संस्कृति के लिए त्याग करें।'

मंदिर मोक्ष और सिद्धि का स्थल

मोहन भागवत ने करीब 30 मिनट तक उपस्थित लोगों को सम्बोधित किया। इस दौरान उन्होंने आगे कहा कि 'समाज में धर्म चक्र परिवर्तन के आधार पर सृष्टि चलती है। शरीर मन और बुद्धि को पवित्र करके ही आराधना होती है और मंदिर हमारी प्रगति का सामाजिक उपकरण हैं। मंदिर में आराधना के समय आराध्य का पूर्ण स्वरूप होना चाहिए। शिव के मंदिर में भस्म और विष्णु के मंदिर में चंदन मिलता है। यह उनकी ओर से समाज को प्रेरणा है।" मोहन भागवत ने कहा, 'मंदिर केवल पूजा नहीं मोक्ष और चित्त सिद्धि का स्थल है। सत्य को प्राप्त करना, अपना आनंद सबका आनंद हो, इसके लिए धर्म ही समाज को तैयार करता है।'

नई पीढ़ी को दें मंदिर संभालने की ट्रेनिंग

मोहन भागवत ने कहा, "मंदिर को नई पीढ़ी को संभालना है तो उन्हें ट्रेनिंग दें। अपने साधन और संसाधन को एक करके अपनी कला और कारीगरी को सशक्त करें। समाज के कारीगर को प्रोत्साहन मिले तो वह अपने को मजबूत करेगा। मंदिर सत्यम-शिवम-सुंदरम की प्रेरणा देते हैं। मंदिर की कारीगरी हमारी पद्धति को दिखाते हैं। मंदिर को चलाने वाले धर्म होना चाहिए। अपने यहां कुछ मंदिर सरकार और कुछ समाज के हाथ में हैं। काशी विश्वनाथ का स्वरूप बदला, ये भक्ति की शक्ति है। परिवर्तन करने वाले लोग भक्त हैं और इसके लिए भाव चाहिए।'