
जानकारी देते प्रदीप नारायण सिंह pc-patrika
वाराणसी: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने स्वीकार किया है कि सारनाथ स्थल बाबू जगत सिंह के द्वारा कराए गए उत्खनन से सबसे पहली बार प्रकाश में सामने आया था। इसको लेकर उनके वंशज लंबे समय से एएसआई के सामने दस्तावेज पेश कर रहे थे। इसके साथ ही सारनाथ स्थित धर्मराजिका स्तूप के पास लगे पुराने शिलापट्ट को हटाकर नया शिलापट्ट भी लगा दिया गया है।
एएसआई ने प्रमाणिक दस्तावेज और ऐतिहासिक साक्ष्य के अध्ययन के बाद यह फैसला किया है कि बाबू जगत सिंह ने ही 18वीं शताब्दी के अंत में सबसे पहले सारनाथ के पुरातात्विक महत्व को उजागर किया था। यह इतिहास लंबे समय तक दबा हुआ था। कुछ वर्षों से जगत सिंह रॉयल फैमिली प्रोजेक्ट शोध समिति के अथक प्रयास के बाद इसे आधिकारिक रूप से मान्यता दे दी गई है। इतिहासकारों का मानना है कि यह इतिहास लेखन की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है।
बाबू जगत सिंह शोध समिति के संरक्षक और जगत सिंह के 6वें वंशज प्रदीप नारायण सिंह के अनुसार, यह कार्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सहयोग से संपन्न हुआ है। समिति ने सभी दस्तावेजों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के समक्ष रखा, जिसके आधार पर अंग्रेजों के काल से चली आ रही गलत मान्यता अब समाप्त हो चुकी है और उसके असली सूत्रधार का नाम अब सामने आ चुका है।
प्रदीप नारायण सिंह ने बताया कि इसमें काशी के विद्वान, विश्वविद्यालय, महाविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू और कोलकाता विश्वविद्यालय समेत कई लोगों के अथक प्रयास से यह उपलब्धि हासिल हुई है। उन्होंने बताया कि यह सिर्फ हमारे लिए ही नहीं पूरी काशी के लिए और ऐतिहासिक विरासत के लिए गर्व की बात है। वहीं, इस बात की जानकारी भारतीय पुरातत्व संरक्षण के डायरेक्टर हेमासागर ए नायक ने सारनाथ स्थित एएसआई के सुपरिंटेंडेंट आर्कियोलॉजिस्ट को लेटर के माध्यम से दी है।
Updated on:
09 Mar 2026 06:13 pm
Published on:
09 Mar 2026 06:08 pm
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