
जोधपुर.राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की ओर से एएनएम भंवरीदेवी ( Bhanvaridevi ) ( Bhanwaridevi ) अपहरण और हत्या( murder ) के मामले में अमरीकी जांच एजेंसी एफबीआई ( fbi ) की गवाह अम्बर बी कार ( Amber B car ) की गवाही वीडियो कॉन्फे्रन्सिंग ( Video Conferencing ) से करवाने की याचना नामंज़ूर करने को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है।
हस्तक्षेप करने का कोई आधार नजर नहीं
न्यायाधीश पीके लोहरा की एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि सभी तथ्यों को देखते हुए ट्रायल कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नजर नहीं आता। सीबीआई ( cbi ) ने अनुसूचित जाति जनजाति मामलात की विशेष अदालत की ओर से 25 जनवरी 2019 को पारित आदेश को पहले निगरानी याचिका दायर करते हुए चुनौती दी थी, लेकिन बाद में सीबीआई के प्रार्थना पत्र को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने याचिका की सुनवाई सीआरपीसी की धारा 482 के तहत शुरू की थी। ट्रायल कोर्ट ने एफबीआई की गवाह अम्बर बी कार की गवाही वीडियो कॉन्फे्रंसिंग( video conferencing ) से करवाने के बजाय उसे सम्मन जारी करने बुलाने का आदेश दिया था।
गाइडलाइन स्वीकार नहीं की
बचाव पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जेएस चौधरी एवं हेमंत नाहटा ने दलील दी कि राजस्थान हाईकोर्ट की फुल कोर्ट ने वीडियो टेली कॉन्फे्रन्सिंग (वीटीसी) के लिए बनाई गई गाइडलाइन स्वीकार नहीं की है और पिछले साल 31 दिसंबर को जारी नए क्रिमिनल रूल्स में भी वीटीसी को लेकर किसी तरह के प्रावधान का उल्लेख नहीं है। अधिवक्ताओं ने अपनी बहस में कहा था कि दंड प्रकिया संहिता में वीटीसी को लेकर कोई उपबंध नहीं है और सीबीआई जानबूझ कर गवाह को पेश नहीं कर के प्रकरण में देरी कर रही है। सीबीआई ने 25 मई, 2017 को गवाह को सम्मन जारी करवाया था, लेकिन अब तक उसे कोर्ट में पेश नहीं करवाया गया। बचाव पक्ष ने सीबीआई पर आरोप लगाते हुए कहा कि एजेंसी ने पिछले दो साल में प्रकरण में देरी करने की कोशिशें की हैं, जिनमें कई बार सम्मन जारी करवाए गए तो कई बार वीटीसी की मांग की गई।
वीटीसी की मांग अस्वीकार
सीबीआई ने अधीनस्थ न्यायालय में छह बार वीटीसी की मांग की, जिसे अस्वीकार किया गया। कई बार इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, जो कि विधि प्रक्रिया का दुरुपयोग है। एजेंसी ने पिछले दो सालों में 16 बार अलग-अलग तरीके अपनाकर बचाव पक्ष के मौलिक अधिकारों का हनन किया है। अधिवक्ता ने यह तर्क भी दिया कि संसद ने सीआरपीसी में वर्ष 2009 में संशोधन किया था, जिसमें वीडियो कॉन्फे्रंसिंग से गवाही के नियम मजिस्ट्रेट ट्रायल के लिए ही बनाए गए, सेशन ट्रायल को इससे दूर रखा गया था। उन्होंने कहा कि अधीनस्थ न्यायालय ने एफबीआई की गवाह को सम्मन जारी कर तलब कर के किसी तरह की विधिक प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं किया है। उन्होंने कहा कि पिछले आठ महीने से इस गवाह के लिए ट्रायल रुकी हुई है और सितंबर, 2018 से अब तक 34 बार तारीखें पड़ चुकी हैं।
गवाह अब तक 19 बार तलब किया जा चुका
कोर्ट ने अपने आदेश में माना कि गवाह को अब तक 19 बार तलब किया जा चुका है और इन आठ महीनों में अभियोजन ने किसी अन्य की गवाही नहीं करवाई। सीबीआई की ओर से कहा गया था कि एफबीआई की गवाह अम्बर बी कार ने अपने पत्र में कहा है कि कार्य का दबाव होने के साथ-साथ वह लंबी यात्रा नहीं कर सकती। कार ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से गवाही देने की सहमति जताई है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कुछ आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि विशेष परिस्थितियों में पूर्व में भी कोर्ट ने इस तरह की अनुमति प्रदान की है।
निगरानी सुनवाई योग्य
उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अपने आदेश में अम्बर बी कार के पत्र के उचित संदर्भ का उल्लेख नहीं किया है, इसलिए इसकी निगरानी सुनवाई योग्य है। कोर्ट ने दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था। कोर्ट ने बुधवार को निर्णय सुनाते हुए कहा कि गवाह ने कोर्ट में आने से कभी मना नहीं किया, बल्कि कुछ कारणों के साथ असमर्थता जताई है। इसलिए ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई अवैधानिकता नजर नहीं आती।